मैं तो तेरे पूजन को -दर्द दिया है-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

मैं तो तेरे पूजन को -दर्द दिया है-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

 

मैं तो तेरे पूजन को आया था तेरे द्वार
तू ही मिला न मुझे वहाँ, मिल गया खड़ा संसार !

मैं तो सुनता था कि सभी से तेरी अलग डगर है,
लेकिन जाना आज कि तेरा चौराहे पर घर है,
बात न थी यह ज्ञात कि मठ में मूरत भर है तेरी
और स्वयं तू भरी भीड़ में खेल रहा बाहर है,
तू क्या है कुछ समझ न पाया केवल इतना देखा
माला तो थी एक, पहनने वाले किन्तु हज़ार !
इसी सोच में बिखर झर गया साँसोंवाला हार !

मैं तो तेरे पूजन को आया था तेरे द्वार
तू ही मिला न मुझे वहाँ, मिल गया खड़ा संसार !

दर्पण तो या एक, देखने वाले कोटि नयन थे,
एक ज्योति से ही ज्योतित सब धरती के आँगन थे,
एक श्वास पर लिये गोद में लाखों जन्म खड़ी थी
एक बूँद से प्यास बुझाने आये सौ सावन थे,
किसे झुकाऊँ शीश कि जब तक मैं कुछ सोच-विचारूँ
मेरा ही धर रूप हो गई प्रतिमाएँ साकार
पहचाना खुद को तब जब नयनों से झरी फुहार !

मैं तो तेरे पूजन को आया था तेरे द्वार
तू ही मिला न मुझे वहाँ, मिल गया खड़ा संसार !

कहता था संसार मर्त्य का कर न तुझे छू पाता,
मुझे लगाने गले मगर तू दौड़ा भुजा बढ़ाता,
बोला था जड़ ज्ञान वायु की भी तुम तक न पहुँच है,
दिखा मुझे तू किन्तु धूल में हँसता-रोता-गाता,
तू मिट्टी है या मिट्टी की क्रीड़ा करने बाला–
जब तक यह जानूँ मिट्टी ने मुझको लिया पुकार
इसीलिए तो मैं घरती पर अम्बर रहा उतार !

मैं तो तेरे पूजन को आया था तेरे द्वार
तू ही मिला न मुझे वहाँ, मिल गया खड़ा संसार !

चिन्तन आया था मेरे ढिग तुझको मुझे दिखाने
लेकिन जितने रूप दिखे सब थे अनबूझ-अजाने,
लिया भोग ने जोग पता देने को मुझको तेरा
किन्तु स्वयं ही भूल गया यह अपने ठौर-ठिकाने,
छिपा कहाँ तू जब तक खोजूँ मैँ इस बड़े नगर में
तब तक मेरे कान पड़ गया जग का हाहाकार !
और तभी से लगा बाँटने मैं दुनिया में प्यार !
कोई आये कोई जाये है सबका सत्कार !

मैं तो तेरे पूजन को आया था तेरे द्वार
तू ही मिला न मुझे वहाँ, मिल गया खड़ा संसार !

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