मैं जी रहा हूँ तेरे बिन-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

मैं जी रहा हूँ तेरे बिन-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

 

तू मुझे अब धीरे धीरे भुला दे
मैं जी रहा हूँ तेरे बिन
तू भी बिन मेरे जी के दिखा दे
तेरा मेरी ज़िंदगी में आना इत्तेफाक बेशक नहीं था
हाँ ये सच है
तुझ पे मेरा कोई कानूनी हक नहीं था
जा ये हक तू अब किसी गैर को दिला दे
मैं जी रहा हूँ तेरे बिन
तू भी बिन मेरे जी के दिखा दे
जानता हूँ तू आज भी
मेरी तस्वीर संग बातें किया करता है
स्याहकाली रात में छुपकर तू सबसे रोया करता है
पर सुन ना,
अब इन नुस्खों को पलकों के पीछे छुपा दे
मैं जी रहा हूँ तेरे बिन
तू भी बिन मेरे जी के दिखा दे
हाँ तुझसे मोहब्बत मैं बेहिसाब करता हूँ
पर अब मैं इकरार करने से डरता हूँ
इस सच को भी अब तू कोई किस्सा बना दे
मैं जी रहा हूँ तेरे बिन
तू भी बिन मेरे जी के दिखा दे
सफर ज़िंदगी का संग आसां होता
न मैं तन्हा होता न तू परेशां होता
देख अब इन ख्वाहिशों की गठरी बांध
तू किसी दरिया में बहा दे
मैं जी रहा हूँ तेरे बिन
तू भी बिन मेरे जी के दिखा दे..!!

 

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