मैं अब सत्य को छिपा नहीं सकता-विश्वप्रिया-चिन्ता अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

मैं अब सत्य को छिपा नहीं सकता-विश्वप्रिया-चिन्ता अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

मैं अब सत्य को छिपा नहीं सकता।
मैं चाहता हूँ, यह विश्वास कर सकूँ कि तुम में व्यथा का अनुभव करने का सामथ्र्य ही नहीं है; क्योंकि मेरा अपना हृदय टूट गया है, और मैं अधिक नहीं सह सकता।
मेरी इच्छा है कि तुम्हें क्रूर और अत्याचारी समझ सकूँ, क्योंकि मेरा उद्धार इसी विश्वास में है कि मैं तुम्हारी बलि हूँ।
हमने- मैं ने और तुम ने- जो भयंकर भूल की है, उस से बचने का इस के अतिरिक्त दूसरा उपाय नहीं है।

19 जुलाई, 1933

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