मैं अधीरता के आँचल सा..-शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi 

मैं अधीरता के आँचल सा..-शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi

 

मैं अधीरता के आँचल-सा, व्याकुल हूँ, बेचैन हूँ,
नीरव मेरी आँख, मीत! पर बरसीं सावन मास-सी।।

ओठों पर आलस सोया है दुःख की चादर तान कर,
उमर-उमर के स्वप्न उठ चले, जाने किस एहसान पर।
चाह-बहुत कुछ कहूँ, न जाने फिर भी क्यों मैं मौन हूँ।
सूखा मेरा कण्ठ, अनोखी लगती एक पिपास सी।।
बरसीं सावन मास-सी।।

जीवन में तुमसे मिलने की ही तो केवल आस थी,
इसीलिए कंकालित-तन में, शेष रहीं दो साँस थीं।
तुम विहान की प्रथम किरन-सी, आईं थीं हँसती हुई,
नव-पाटल के मृदुल-मुकुल पर, शबनम-सी लसती हुई।

खिला हृदय का कमल-हास ढल गया, दीन की देन हूँ।
उफन-उफन सो गईं उमंगें डूबी हुई उसाँस सी।।
बरसीं सावन मास-सी।।

विपुल-वेदनामय कारा-सी, घनी उदासी छा गई।
आशा-बद्ध, भाव-सरिता को राह अचानक पा गई।
उफन पड़ी फैली यौवन के आतुर मूक उभार-सी।
छिट-पुट सुख के प्रहर, धान की खेती बनी उजार-सी।

परिचित पंछी उड़े गगन में, प्रश्न-चिह्न मैं कौन हूँ?
शरद्-यामिनी बीत चली अब, छायी एक कुहास-सी।।
बरसीं सावन मास-सी।।

तुमने तो निर्ममता की दीवारें हँस-हँस पार कीं-
मुझसे छिनीं अजस्र राशियाँ ममतामयी दुलार की।
मेरे लिए भोर, एकाकी सन्ध्या है वीरान की।
इतना हूँ दरिद्र, सेवा फिर कैसे हो मेहमान की?

निशि के अन्तर में आँधी क्या, तूफ़ानों की बात है।
मेरी आशाएँ झूठी हैं, बिना दिए विश्वास-सी।।
बरसीं सावन मास-सी।।

शबनम-सा, आ कर दुपहर को शोक-ताप सा ढल गया,
तो क्या जीवन? यही कि जग को एक संदेसा मिल गया।
यह परोक्ष संदेश विश्व यदि ले पाया-तो धन्य हूँ।
कभी न जो धुल सके, अन्यथा, ऐसा कलुष जघन्य हूँ।

बाती नेह-विहीन ज्योति का जीवन जैसा क्षीण हूँ।
जली बहुत, अब बुझी जा रही रंगमंच उपहास-सी।।
बरसीं सावन मास-सी।।

-23 दिसंबर, 1962
-‘साहित्यालोक’ में प्रकाशित

 

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