मैं अक्सर-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

मैं अक्सर-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

 

मैं बहुत ज्यादा सोचता हूँ अक्सर
और करता हूँ बहुत शिकायतें
चिलचिलाती धूप की
कड़ाके की ठंड की
गाड़ियों के शोर की
आस पास फैली गंदगी की
निम्न स्तर के राजनीति की
चार लोगों के सोच की
किसी के नैन-नक्श की
और अपने मन की जो ये सब सोचता है!

मैं कम सोचता हूँ अक्सर
और करता हूँ कम ही चर्चा
बरसों से सूखी पड़ी मिट्टी पर पड़ने वाली पहली बूँद की
बादल के पीछे छुपे सूरज की छितराती किरणों की
बदन को छेड़ती ताजी, ठंडी हवाओं की
पेड़ की डाल पर कूकती कोयल की
गोल गोल घूम आपस में खेलते धूल और पत्तों की
नदी के किनारे फैले सन्नाटे को भंग करती लहरों की
खुद की डायरी के फड़फड़ाते पन्नों की
और अंततः अपने मन की जो ये सब सोचता है..!!

 

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