मैंने उससे पूछा-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

मैंने उससे पूछा-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

मैंने उससे पूछा?
तुमने कभी बहता दरिया देखा है।
उसने सतलुज का नाम लिया।

कहाँ देखा?
उसने कहा पहाड़ से उतरता।
मैंने कहा! इतना वेग भरा दरिया?
न देखा कर!
आदमी खूंखार हो जाता है।

कभी रावी देखा
डेरा बाबा नानक के पास
लहर लहर बहती शांत
सवेर का कलेवा लेकर
खेतों में जाती नवयौवना की तरह
ठुमुक ठुमुक चलती।
हवाओं को गीत सुनाती
चुपचाप सरहद पार करती
करतारपुर साहब मत्था टेकती
फिर मुड़ आती रामदास के पास।
बाबा बुड्ढ़ा जी के चरण परस
फिर चली जाती डेरा साहब लाहौर।
ऐसा लगता तीरथ करती फिरती है
ऐरावती नदी।

मैंने पूछा?
तुम कभी सूखने को पड़े
दोशाखा फँसा कर चारपाई की छाँव
मकई के दानों की रखवाली में बैठे हो?
उसने कहा
हाँ! छोटा था तो बहुत बार।
या फिर पसारे गेहूँ के दानों पर
पाँवों के छाप छोड़ती दानों को चुगती
घुघ्घी देखी थी।
उसने कहा
हाँ, तुम्हें कैसी-सी लगती थी?
मैंने कहा,
तेरी तरह धीमे धीमे हँसती।
पपोटों से सेवइयाँ बटती मेरी माँ जैसी।
अब भी मुँह स्वाद से भर जाता है याद करके।
मैंने उससे बहुत बातें की।
यह भी कि मेरी बड़ी बहन मनजीत ने
जब चूल्हे के आगे पड़ी राख बिछा कर
मेरे लिए पहली बार ‘अ’ लिखा था।
सच उस जैसा आनंद
रूह को कभी नहीं आया।
वह ‘अ इ’ चलाए फिरता है आज तक।

उसने कहा,
तुम कहाँ से लेते हो कविता का नीलांबर
फुलकारी जैसी धरती को
कैसे गीतों में पिरोते हो?
मैंने कहा!
सब कुछ उधार का है इधर-उधर से।

मैंने पूछा तुमने कभी दरिया के पास जा
उससे बातें की?
उसने कहा, नहीं!
हर बार दरिया ही मेरे पास आता है।
बहुत कुछ सुनाता है, तेरी तरह।
मैं धरती हूँ, सिर्फ़ सुनती हूँ।

 

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