मेरे हिमालय के पासबानो-वंशीवट सूना है -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

मेरे हिमालय के पासबानो-वंशीवट सूना है -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

मेरे हिमालय के पासबानो! मेरे गुलिस्ताँ के पासबानो !
उठो कि सदियों की नींद तजकर तुम्हें वतन फिर पुकारता है !

लिखो बहारों के नाम खत वो
कि फूल बन जाएँ ख़ार सारे,
वो रोशनी की लगाओ क़लमें,
ज़मीं पै उगने लगें सितारे,
बदल दो पिछले हिसाब ऐसे, उलट दो ग़म के नक़ाब ऐसे,
कि जैसे सोई कली का घूँघट सुबह को भंवरा उघारता है
मेरे हिमालय के पासबानो!

ग़रीबी जो बन के रोज़ ईंधन
उदास चूल्हों में जल रही है,
वह जो पसीने की बूँद गिरकर
ज़मीं का नक्शा बदल रही है
तुम उसके माये मुकुट सजा दो, मुकुट सजाकर दुल्हन बना दो
जो आँसुओं को उबारता है वह ज़िन्दगी को सँवारता है!
मेरे हिमालय के पासबानो!

है ज़ोरो-ज़ुल्मत का दौर ऐसा
मना है फूलों को मुस्कराना
इधर है मज़हब का जेलख़ाना
उधर है तोपों का कारखाना
मिटा दो फ़िरकापरस्ती जग से, ढहा दो नफ़रत की हर हवेली
कि एक शोला धधके सारे मकाँ की सूरत बिगाड़ता है!
मेरे हिमालय के पासबानो!

बहे न आदम का खून फिर से
न भूख दुनिया की उम्र खाए
क़रीब मंदिर के आये मस्जिद,
न फिर कोई घर को बाँट पाये,
नहीं यह सोने का वक्त भाई । नहीं झगड़ने की यह घड़ी है
वह देखो केसर की क्यारियों को गँवार पतझर उजाड़ता है!
मेरे हिमालय के पासबानो!

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