मेरे स्वप्न-जलते हुए वन का वसन्त-खण्ड तीन-दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

मेरे स्वप्न-जलते हुए वन का वसन्त-खण्ड तीन-दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

मेरे स्वप्न तुप्तारे पास सहारा पाने आएँगे ।
इस बूढ़े पीपल की छाया में सुस्ताने आएँगे।

हौले-हौले पाँव हिलाओ, जल सोया है छेड़ो मत,
हम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आएँगे।

थोड़ी आंच बची रहने दो, थोड़ा धुआँ निकलने दो,
कल देखोगी कई मुसाफिर इसी बहाने आएँगे।

उनको क्या मालूम निरूपित इस सिकता पर क्या बीती,
वे आए तो यहाँ शंख-सीपियाँ उठाने आएँगे ।

फिर अतीत के चक्रवात में दृष्टि न उलझा लेना तुम,
अनगिन झोंके उन घटनाओं को दोहराने आएँगे।

रह-रह आँखों में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी,
जागे और बढ़े तो शायद दृश्य सुहाने आएँगे ।

मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता,
हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आएंगे ।

हम क्यों बोलें-इस आँधी में कई घरौंदे टूट गए,
इन असफल निर्मितियों के शव कल पहचाने जाएंगे ।

हम इतिहास नहीं रच पाए इस पीड़ा में दहते हैं,
अब जो धाराएं पकड़ेंगे, इसी मुहाने आएँगे।

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