मेरे विचार मेरे मित्र-अंतर्यात्रा-परंतप मिश्र-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Parantap Mishra

मेरे विचार मेरे मित्र-अंतर्यात्रा-परंतप मिश्र-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Parantap Mishra

 

मैं अक्सर मिलता रहता हूँ

अपने विचारों के साथ
ये मेरे सच्चे मित्र रहे हैं
जब भी मुझे अकेलेपन का आभास होता है
ये मुझसे मिलने चले आते हैं
साहचर्य की अनुभूति प्रतीत होती है
ह्रदय की गहराईयों से मैं उनका स्वागत करता हूँ
मेरे विचारों का और मेरा अटूट आत्मिक सम्बन्ध है
हम एक दूसरे के पूरक जो हैं
ये हमेशा मेरे साथ रहते हैं

एक दिन मैं नितांत अकेला बैठा था
मेरे विचार मुझसे मिलने आये
मैंने बहुत खुश होकर उनका स्वागत एवम अभिन्दन किया
कुशल – क्षेम औपचारिक संवाद पश्चात्
एक विचार ने मुझसे कहा-
“मित्र ! क्या तुम स्वयं से भी कभी मिलते हो ?
तुम्हें नहीं लगता की तुम कितने बदल चुके हो
तुम्हारा जीवन कितना नकली और कृत्रिम हो गया है
भौतिक विकास की अंतहीन दौड़ में
क्या तुम स्वयं को भूल गए हो ?”
मैंने कहा -“हम विकास के पथ पर हैं,
सतत विकसित हो रहे हैं ?”

अत्यंत समीप आकर अन्य विचार ने बड़े प्रेम से कहा –
“मेरे मित्र ! तुमने अपना बाहरी विकास तो बहुत कर लिया
पर अंदर से उतने ही खाली और शक्तिहीन हो गए हो
आन्तरिक विकास शून्य है।
अब तो तुम केवल कृत्रिम वस्तु रह गए हो
तुम्हारे सभी क्रिया-कलाप दिखावा मात्र हैं
बहुत दूर हो चुके हो स्वाभाविकता से, प्रकृति से
तुम्हारी ‘दया, प्रेम, करुणा और विश्वसनीयता मात्र भ्रम है
जो कुछ भी तुम करते हो उसका यथार्थ से कोई मतलब नहीं
तुम्हारे होंठ हँसने का झूठा क्रम करते हैं
अत्यंत निराशा निमग्न, फिर भी खुश दिखने की कुचेष्टा
हृदय से अलग थलग तुम्हरी हँसी विष की तरह है
यहाँ तक की तुम्हारा प्रेम भी एक ढोंग से ज्यादा कुछ नहीं।

तुम्हरी दया एक औपचारिकता से अधिक नहीं
करुणा को तुमने मात्र अभिव्यक्ति तक सीमित कर दिया है
विश्वसनीयता मृतप्राय हो चुकी है
अब तो कुछ भी तुम हृदय से नहीं करते
कृत्रिमता के बोझ तले वास्तविकता दम तोड़ रही है
फिर भी देखो मनुष्यों के विचार और विकास की ललक
कैसा विकास किया तुमने मेरे मित्र !

पृथ्वी को सीमा रेखाओं में विभाजित कर कितने भाग कर दिए
मनुष्यता को तुमने धर्म, भाषा, रंग, जाति में बाँट दिया
इस पर भी क्या तुम संतुष्ट रह सके ?
कभी देखा है प्रकृति का रमणीय सौन्दर्य
सुवासित पवन, सूर्य का आलौकिक प्रकाश, कल कल करती नदियाँ,
गर्व से उन्मत्त पर्वत, झूमते वृक्ष, इठलाती कलियाँ, भौरों का गुंजन
चिड़ियों की चहचहाहट, शीतल चंद्रमा
यह सभी देश, काल, भाषा, रंग और जाति से परे हैं
तुम्हारी असमर्थतता है कि तुम इसे बाँट न सके
तभी यह सब कृत्रिम होने से बच सके
और प्राकृतिक आनंद से सराबोर नैसर्गिक जीवन जी रहे हैं
इन्होंने कोई भेद या सीमा-रेखा नहीं निर्धारित की
इन्होंने अपने आपको बनावट से परे रखा है
उनके लिए सब समान हैं
इसलिए वे अंदर और बाहर से संतुष्ट हैं।

बाहरी विकास एक छलावे से अधिक कुछ भी नहीं
प्रकृति की सुन्दरता सभी के लिए समान है
सुगन्धित पुष्पों से सुरभित वायु किसी एक के लिए नहीं
सूर्य का जीवन दाई प्रकाश चराचर जगत के लिए है
लहराती नदियों का जीवन संगीत सबका है
वृक्षों का अमृत फल
आसमान में तैरते हुए पक्षी सीमा-रेखा से विभाजित नहीं
जबकि तुमने सबकुछ कई भागों में विभाजित कर लिया है।
तो तुमने स्वयं को भी बांटने से नहीं चूके
अब जब कुछ भी न बचा

अब तुम, तुम नहीं रह गए
भौतिक विकास का एक कृत्रिम संयंत्र मात्र रह गए
जीवन की मृगतृष्णा और अंतहीन दौड़ का हिस्सा हो

बनावट, दिखावा, प्रचार एवं आत्मप्रशंसा के अभिशाप से युक्त
उपकरण में मेरे मित्र ! कुछ भी स्वाभाविक नहीं होता
केवल एक ढाँचा, प्राकृतिक गुणों से वंचित
जिसको केवल परिष्कृत और परिमार्जित किया जाता रहा है।”

मैं थोड़ा असहज हो चला था
मेरी स्थिति को भाँपते हुए उन्होंने कहा-
“सोचो, क्या मानव और यन्त्र में कोई भेद रह गया है ?
तब तक के लिए विदा मेरे प्रिय
हम फिर मिलेंगे ”

 

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