मेरे देस के नौनिहालों के नाम-कविता -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

मेरे देस के नौनिहालों के नाम-कविता -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

वो गुंचे जो शबनम की इक बून्द
खिलखिलाने की उम्मीद लेकर
हमेशा तरसते रहे
वो लालो-गुहर
जिन्हें गुदड़ियों के अंधेरे से बाहर
चमकते हुए दिन की हर इक किरन
जगमगाने से पहलू बचाती रही
जिनके नन्हें दिलों के कटोरों में
महरो-मोहब्बत का रस
कोई टपकानेवाला न था
जिनकी मरहूम आंखें
उनकी मांयों की सूरत
मिरे देस की सारी मांयों की सूरत
आनेवाले दिनों में
हंसी के उजालों की रह तक रही हैं

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