मेरे अन्तर-तार सप्तक -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh 

मेरे अन्तर-तार सप्तक -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh

मेरे अन्तर, मेरे जीवन के सरल यान,
तू जब से चला, रहा बेघर,
तन गृह में हो, पर मन बाहर,
आलोक-तिमिर, सरिता-पर्वत कर रहा पार !
वह सहज उठा ले चला सुदृढ़ तपते जीवन का महा ज्वार,
उसके द्रुत-गति प्रति पदक्षेप से झंकृत हो उठ रहा गान,
जो नव्य तेज का भव्य भान ।

घर की स्नेहल-कोमल छाया में रहा महा चंचल अधीर ।
वे मृदुल थपकियां स्नेह-भरी,
वे शशि-मुसकानें शुभंकरी,
सब को पाया, सब को झेला पर स्वयं अकेला बढ़ा धीर ।
जीवन-तम को संगीत-मधुर करता उर-सरि का वन्य नीर,
ऐसा प्रमत्त जिस का शरीर, उन्मत्त प्राण-मन विगत-पीर !!

यह नहीं कि वह था तुंग पुरुष
जो स्वयं पूर्ण गत-दु:ख-हर्ष
पर ले उस के धन ज्योतिष्कण जो बढ़ा मार्ग पर अति अजान ।
उसके पथ पर पहरा देते ईसा महान् वे स्नेहवान् ।
छाया बनकर फिरते रहते वे शुद्ध बुद्ध सम्बुद्ध-प्राण ।।
यह नहीं कि करता गया पुण्य,
उसका अन्तर था सरल वन्य,
तम में घुस कर चक्कर खा कर वह करता गया अबाध पाप ।
अपनी अक्षमता में लिपटी यह मुक्ति हो गयी स्वयं शाप ।
पर उसके मन में बैठा वह जो समझौता कर सका नहीं,
जो हार गया, यद्यपि अपने से लड़ते-लड़ते थका नहीं;
उस ने ईश्वर-संहार किया, पर निज ईश्वर पर स्नेह किया ।
स्फुरणा के लिए स्वयं को ही नव स्फूर्ति-स्रोत का ध्येय किया
वह आज पुन: ज्योतिष्कण हित
घन पर अविरत करती प्रहार,
उठते स्फुलिंग
गिरते स्फुलिंग
उन ज्योंति-क्षणों में देख लिया
करता वह सत्य महदाकार !
सन्नद्ध हुआ वह ज्वाल-विद्ध करने को सारा तम-पसार,
वह जन है जिसके उच्व-भाल पर
विश्व-भार, औ’ अन्तर में
नि:सीम प्यार !!

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