मेरी साँस-कविता- सी.नारायण रेड्डी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita C. Narayana Reddy Part 2

मेरी साँस-कविता- सी.नारायण रेड्डी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita C. Narayana Reddy Part 2

 

आग और आदमी

दो पहर
खड़ी सरासर!
ज्वलित आग।
फ़ौलादी इमारतों से
सीमेंट के शिखरों से
क़िलों से,
विल्लाओं से
विकट अट्टहास करती हुई,
सहस्रफण खोलती
लपलप लपटें,
विकट आग!!

अधिकारी आँख खोल रहे हैं।
अपना-सा मुँह लिये जा रहे हैं।
टेलीफोन हैं-चीखते-रो पड़ते,
फैरिंजन हैं-चीत्कार करते।
भगदड़
भोंपू भोंकार करते,
जल फूँकार करते!

आग बुझती नहीं-
मस्तकों में, मस्तिष्कों में
आँखों में, पाँवों में
निर्मित अट्टालिकाओं में,
लपेटी वस्त्रावली में,
है पागल आग!!
लाल लपटें!!
बिलकुल बुझती नहीं,
किसी को कुछ सूझती नहीं,

ऊसर-सर खुजलाने वाली उंगलियाँ,
पृष्ठ धरा के कुरेदने वाली पैर की उंगलियाँ,
क्षणों को लपेट लेने वाली आहें,
मिनटों को जलाने वाली सिगरेटें,
पाताल-गुफा में प्रविष्ट हुईं
परस्पर कुछ समझौता कर।
कमरे भर में जम्भाई ली धुएँ ने
अयाल हिला उठ खड़ी हुई वंचना!

आग बुझाने की दवा है एक मात्र,
विद्युत् प्रसार बन्द हुआ हठात्।
बात बतंगड बन गयी।
यंत्रों की आँखें पड़ गयीं पीली
घर-आँगन हो गये सूने।
हाथ-पैर पड़ गये ठण्डे।
ताकत ने मानी हार,
बन्द हुआ रक्त प्रसार।
नगरों के मुख पर है फेन,
नागरिकता की देहभर स्वेद
गर्मी ठंडी हुई।
नाडी मंद पड़ गयी।
गति गयी रुक
कांति हुई अवाक्
लपटें हुईं ढेर।
एकदम गयीं बुझ।
आग बुझ गयी, पर
आदमी गया नहीं बुझ।
प्रचंड मार्तण्डबिम्ब जैसा,
प्रबल आंदोलन जैसा,
मनीषी मनस्वी मानुष बुझा नहीं।
मार्कंडेय जैसा,
मारुति जैसा,
महोज्ज्वल भावी चिंरजीव
मानव बुझ नहीं सकता।

(अनु.: डॉ. रामुलु और डॉ. रेगुलपाटि)

 

एकाकी दीप

एकाकी दीप की जलती बाती,
यों ही
दिशाओं को निहार रही है
चारों ओर देखती है।
उन्मत्त तरुण तिमिर
काले-काले बालों की लटें खोले
नाच रहा है, नाच रहा है।

मिट्टी का दीन दीप
उसमें नन्हीं-सी बाती
देखती रह जाती है।
युवा पवन
इधर से उधर
झूम झूम विचरता है
पंगु दीप की अविचल बाती
टुकुर-टुकुर झाँकती है।

बाती सोचने लगी-
मैं भी-
तरुण तिमिर की तरह
तांडव कर पाती,
युवा पवन की भाँति
झूम झूम इठलाती,
तो-
इस पन्थी के पंजर से छूट जाती
पंछी बन कर
अनन्त गगन में उड़ जाती।

दीपक के नेत्रों में-
अज्ञान घिर आया
अचानक हवा के झोंके का
थप्पड़ पड़ा
बेचारी बाती की साँस घुट गई
शापग्रस्त शरीर की भाँति-
काली पड़ गई।

बाती पछताती है-
तरुण तिमिर की तरह
नाच-नाच कर
दुनिया के मुँह पर
कालिख लगाने से
पन्थी में बन्दी बन
कनक किरण बाँटना ही
अच्छा है!

(अनुः डॉ. श्रीराम शर्मा)

 

सन्ना ज़ाजी फूला माला

(हैदराबाद नगर में सन्ध्या समय कुछ लोग
फूल बेचने निकलते हैं। महिलाएँ उनकी प्रतीक्षा
करती हैं। फूल बेचने वाले बालक, युवा, बूढ़े, सभी
आयु के होते हैं। मौसम के अनुसार फूल बदलते
रहते हैं। चमेली के फूल और उनकी माला बेचते
समय संगीत भरे स्वर में आवाज लगाते हैं-सन्ना
ज़ाजी फूला माला। प्रत्येक शब्द का अन्तिम स्वर
प्लुत रहता है। ज़ाजी (चमेली) के फूल बेचने वाले
एक मुसलमान लड़के से प्रेरित होकर यह कविता
लिखी गयी है।
– अनुवादक)

एक मुसलमान बालक के कंठ से गोलि की बेला
चीख उठी है-
सन्नाss ज़ाजीss फूलाss मालाss
भूखे लड़के की फटी ज़िन्दगी से-
महकनेवाली भूख-
कितनी खूबसूरत है!
कितने ही क़बरी-भार
बाट जोहते होंगे,
चौकड़ियाँ भर कर
टोहते होंगे,
चमेली की इस माला के लिए
इस गन्ध-लहरी के लिए।

सन्ध्या और कजरारी हो गयी
लड़के का कंठ तृप्त हो गया
चमेली से गुंथे हृदयों में-
सौन्दर्य-लालसा करवटें लेने लगी
चमेली के फूल-
शहनाई के जो सुर भर रहे हैं
नन्हा लड़का उन्हें क्या जाने!
ये चमेली के फूल-
चाँदनी की जो पगडंडियाँ बिछा रहे हैं-
वह भूखा बेचारा उन्हें क्या जाने! व

ह माँ का दुलारा
मुट्ठी के पैसों को
बार-बार
माथे से लगाता है
और-
खटिया पर लेटी
बुढ़िया माँ की ओर-
पंख लगा कर उड़ जाता है।

(अनु.: डॉ. श्रीराम शर्मा)

 

मानव-गीत

तेरा यह गीत, मीत!
मेरा यह गीत, मीत!
तेरी मेरी मैया
धरती का गीत मीत!

भू पर चमकते नयन-
जल की बूंदें चुनता।
धूल भरे नर के उर के
अफ़साने बुनता।

स्वेद सनी माटी को
चंदन सा उर धरता।
निश्वास-निहित स्वर को
ओंकार समझ स्मरता।

माटी की कुटिया में
नव हृदयाशय रचता।
स्वर्ण-सौध से जीवन-
पाठ सीखता, पचता।

कंठ-मध्य गरल धार
बाँट रहा स्मिति अमृत।
शिव के प्रति-रूप मनुज के
आगे मैं प्रणमित।

सर के वर करुणामय
मानव के सिवा कौन?
मंदिर-रहित देवता
मानव के सिवा कौन?

जिसने अणु को फोड़ा
जग को किया अखाड़ा
नहीं नहीं वह मानव
छद्म-वेष में दानव।

शतदल-से खिले जगत
को पल में क्षार-क्षार
करने के दैत्य-यत्न
का विरोध दुर्निवार।

देख भले को सम्मुख
बुरा झुका लेता सिर
शिशु की मुस्कान देख
पशु-विषाण जाते फिर।

जंग लगेगा म्यानों में
खड्गों पर यारो!
लगेगी फफूँदी उन
छुपे बमों पर यारो!

हाथ हाथ मिला, खिले
फिर नर में नरम स्नेह।
सिकुड़े उर में दौड़े
उष्ण-रुधिर का प्रवाह।

कौन गंध को रोके,
गंध-वाह को टोके
मनुज-रवि-ऋचा, कवि का
वचन भला क्यों चूके?

(अनु. : आलूरि बैरागी चौधरी)

 

मोड़

दुर्लभ प्राचीन-प्रति-सम हृदय की रक्षा करता हुआ
मंज़िल पर पहुँचने के स्वप्न देखता हुआ
टीलों पर चढ़ता, उन्हें मरकत की कालीन समझता
पगडंडी कहीं फूलों की कहानी सुनता
मोड़ पर पहुँच, मुड़ रहा मानव।

ढलके अतीत के बारे में निश्वास छोड़ने वालों को
पिघलते वर्तमान को देख घबराने वालों को
भावी प्रकाश को देख खिडकियाँ बंद करने वालों को
धता बता आगे बढ़ रहा मानव।
मोड़ पर पहुँच, मुड़ रहा मानव।

सपनों में पी हुई सहारा की शोभा को
शैशव के कोमल कपोलों पर पाटल की अरुण आभा को
हृदय में घुट घुट पीता, मन ही मन जुगाली भरता
आगे आगे बढ़ रहा मानव।
मोड़ पर पहुँच, मुड़ रहा मानव।

ठूठ के माथे पर पल्लवित प्रवालों की रेखा को देखता
मरु-स्थल में विरचित मरकत-मालाओं को देखता
हिम का उष्णीस धरे शीत-शैल की ओर ताकता
पाथेय की उपेक्षा कर पाथो-राशि लाँघता
पवमान की भाँति क्षिप्र प्रस्थान कर रहा मानव।

 

(अनु.: आलूरि बैरागी चौधरी)

 

मध्यवर्ग की मुस्कान

मैं मुस्काता हूँ छन्दरहित भाषा में
किन्तु भूल नहीं सका-
मुस्कान भी छन्दबद्ध होती है!

सागर के उदर से-
सर ग म के सुर-
चुन-चुन लाता हूँ
समाज के अन्तस्तल में
डमरू-नाद सुनता हूँ
देखता हूँ
आह भरता हूँ
शारदीय दुग्ध धवल-
मेघ फेनों में घलती नीलिमा
और-
दधि जैसी शरच्चन्द्रिका में
स्निग्ध गाँठे
प्लास्टिकी मस्कान के पीछे
छिपनेवाले-
संसृति-रहस्य का
अवलोकन करता हूँ
नाइलोनी जीवन से आवेष्टित
करुण कथा छानता हूँ।
बढ़ती हुई कीमतों पर
होठों से फिसलती उपेक्षा भी-
मैंने समेट ली है
और सीखा है-
कई घड़े सपने पी कर-
अपना उदर भरना।

हृत्पिण्ड दो खण्डों में बँटा-
उस दिन मैं ऐसा पक्षी था
जिसका एक पंख कट कर गिर गया था
वही भग्न हृदय
जब हज़ार टुकड़ों में बँटता हो
मैं आग भखने लगा हूँ
विवश, अवश!

विषपायी नीलकंठ की पीढ़ी का
मैं अन्तिम वारिस हूँ
बाप-दादा-परदादा की-
कीर्ति-परम्परा का-
अवशिष्ट-ताम्रपत्र मात्र हूँ!
सस्मित सजीव शव का-
मैं हूँ रत्नहार।

मध्यवर्ग के मनोवपु का-
निराला नासूर हैं,
मैं ऐसे हंस की चोंच का अन्वेषी हूँ
जो वंचना से साधुता को पृथक कर दे।
और
लतियातें विधायकों की
दुग्धोनी को सहला रहा हूँ
पीयूष पाने के लिए।
निःश्वासों का सेत पग-पग पार कर
सदाचार तक पहुँचा हूँ।
निराशा की वट-जटाओं को पकड़कर
अम्बर का आँचल छूता हूँ।
धनुष-सी झुकी कमर से
विजयादशमी मनाता हूँ!
मोड़ बँधे आदर्शों से-
करोड़ों दीपक सँजोता हूँ।

(अनु. : डॉ. श्रीराम शर्मा)

 

नागार्जुन सागर

इक्ष्वाकु वंश के
राजचन्द्रों की कीर्ति-चन्द्रिकाएँ
जब चारों दिशाओं में
फैली थीं,
अपनी मधुर ध्वनियों से
सारी दिशाओं को भर दिया था,
श्री पर्वत
जब सिंहलदेशागत बौद्ध भिक्षुओं का
विज्ञान पीठ बना था,
जब सिद्धार्थ के विशुद्ध
सिद्धांत-बीज
बड़े-बड़े वृक्ष बनकर फैल गए थे,
तब मैं अपने को
विद्यामान मानकर
अपने हृदय का विस्तार करके
गीत-काव्य लिखता हूँ।

लो, देखो ! कृष्णा नदी
नव अप्सरा के समान
आंध्रभूमि के नंदन वन में टहलती है।
लो दर्शन करो !
कृष्णा नदी द्रवमान बौद्ध धर्म के रूप में
बहती है।

वह एक बार बढ़े तो
अवनत शातवाहनों की वैभनोन्नति
आज भी उसमें
आकाश-गंगा की तरंगों का स्पर्श करेगी।
वह एक बार
मुख खोलकर गर्जन करे तो
ऐसा विदित होता है कि
मानों सहस्रों किन्नर और किन्नरियाँ
वीणाओं के हृदय-तारों को
झंकृत करते हों।
वह एक बार
चौंक पड़े तो
ऐसा मालूम होता है
कि अमरावती के मंदिरांतर्गत शिलारूपी
शय्याओं से जाग पड़ने वाली
अप्सराओं के शरीर की लचक हो
और सौन्दर्य की बिजली
दौड़ती हो।

सुंदर चाप भी उसकी भौंहों के समान नहीं होगा
ऐसा कोई रूप नहीं है
जिसे उसकी तरंगों ने न ग्रहण किया हो।
उसकी लहरें ज्यों अभिसारिकाओं के
मंदवायु में हिलने वाले कोमल वसनांचल के
समान,
शरदाकाश में रूई के समान
धीरे-धीरे आगे बढ़ने वाले मेघों की भाँति,
चित्र-विचित्र गतियों से बढ़ती हैं।
ऐसा भान होता है कि
वे स्वयं कविताएँ हों।

उसकी लहरें बोधिसत्व के सिर पर
सदा परिवेष्टित
एवं दुर्निरीक्ष्य तेजोमय लहरों के समान
तथा उनके अपांगों की छाया में
लहराने वाली
करुणार्द्र भावनाओं की
तरंगों के सदृश अत्यधिक दिव्यरूपों को
धारण करती हैं
और दृष्टि से ओझल होती हैं।

उसदी गोद में
हरे-भरे मैदान निद्रित शिशुओं की भाँति
शोभित हैं। उसकी दाहिनी ओर
सहनशीलता की राशि
श्री पर्वत स्थित है। नागार्जुन के पदार्पण-मात्र से
श्री पर्वत-चंद्रिका-सदृश
शोभित हुआ है।
नागार्जुन के उपदेशामृत की ध्वनि में
श्री पर्वत नवनीत के रूप में
विकसित हुआ है।
नागार्जुन के मस्तिष्क में
असीम वैभव के साथ
विज्ञान रसायन-ज्ञान के रूप में
उमड़ पड़ा।

नागार्जुन का दिखाया हुआ
नवीन मार्ग
बौद्ध-धर्म-रूपी सौध तक
पहुँचने का सोपान है।

नागार्जुन के प्रति
उमडऩेवाली भक्ति के
अपार संभ्रम में
श्रीपर्वत अपना नाम तक भूल गया।
यहाँ तक कि
नागार्जुन पर्वत नाम से
नव-वैभव के साथ
प्रवर्तित हो चला।

(अनुः आलूरि बैरागी चौधरी)

 

दीप के नूपुर

चलती-फिरती मिट्टी की गगरी-सा
मेरा तन,
जिसमें शिक्षा-जाल को छु कर
स्पन्दित विद्युत्-धारा।

आधिभौतिक देह मेरी
वेदिका
आधियाजिक रूप नूपुर बाँधकर
वह है जगन्मोहिनी, जो
दीप के नूपुर से अनुरणित
और अक्षरवाहिनी
अन्तरात्मा के लिए जो दृश्य है।

पल्लवारुण अँगलियाँ
होकर तरंगायित
अन्तःकरण की कर गयीं
क्षालित तमिस्रा
तब हृदय मेरा
हविष-उद्गगत धूम-सा
होता प्रसारित
तब अन्तरात्मा
कामधेनु
पावसने लगी।

ब्रह्माण्ड पन्थी-सा हुआ दीपित
उस पन्थी में
स्नेहामृतवर्ती ईश-सा
हो उठा आलोकित।

हे दीप-नूपुर वाणि !
हे दिव्यत्व भासिनि!
शाश्वत करो मुझको
अनुरणित।

जब तुम्हारी अँगुलियों की दीप्ति
मेरे हृदय में
प्रति दिवस होगी प्रसारित
मायाग्रस्त मेरा जीवन
महत्कान्ति का मण्डल बनेगा।
तुम्हारे नूपुरों की झनकार
मुझे देगी सुनायी अहर्निश
मृण्मय देह में तब
चिन्मय नाद होगा यह निनादित।

(अनुः डॉ. श्रीराम शर्मा)

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