मेरी रक्षा करो विपत्ति में, यह मेरी प्रार्थना नहीं है-गीतांजलि-रवीन्द्रनाथ ठाकुर -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rabindranath Tagore Gitanjali (विपोदे मोरे रक्षा क’रो, ए न’हे मोर प्रार्थना)

मेरी रक्षा करो विपत्ति में, यह मेरी प्रार्थना नहीं है-गीतांजलि-रवीन्द्रनाथ ठाकुर -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rabindranath Tagore Gitanjali
(विपोदे मोरे रक्षा क’रो, ए न’हे मोर प्रार्थना)

मेरी रक्षा करो विपत्ति में, यह मेरी प्रार्थना नहीं है;
मुझे नहीं हो भय विपत्ति में, मेरी चाह यही है।
दुःख-ताप में व्यथित चित्त को
यदि आश्वासन दे न सको तो,
विजय प्राप्त कर सकूँ दुःख में, मेरी चाह यही है।।
मुझे सहारा मिले न कोई तो मेरा बल टूट न जाए,
यदि दुनिया में क्षति-ही-क्षति हो,
(और) वंचना आए आगे,
मन मेरा रह पाये अक्षय, मेरी चाह यही है।।

मेरा तुम उद्धार करोगे, यह मेरी प्रार्थना नहीं है;
तर जाने की शक्ति मुझे हो, मेरी चाह यही है।
मेरा भार अगर कम करके नहीं मुझे दे सको सान्त्वना,
वहन उसे कर सकूँ स्वयं मैं, मेरी चाह यही है।।
नतशिर हो तब मुखड़ा जैसे
सुख के दिन पहचान सकूँ मैं,
दुःख-रात्रि में अखिल धरा यह जिस दिन करे वंचना मुझसे,
तुम पर मुझे न संशय हो तब, मेरी चाह यही है।।

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