मेरी माँ-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

मेरी माँ-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

मेरी माँ को
स्वैटर बुनना नहीं आता था
पर वह रिश्ते बुनना जानती थी।
माँ को तैरना नहीं आता था
पर वह तारना जानती थी।

सरोवर में घुसा कर कहती
डर न, मैं तेरे साथ हूँ।
अब भी जब कभी ग़म के सागर या
मन के बहाव में बहने लगता हूँ
तो माँ डूबने नहीं देती।

मरने के बाद अब भी मेरे पास आ खड़ी होती
मेरी आँखें पोछती और कहती,
तू मेरा पुत्र है और तेरी आँख में आँसू?

यदि मेरा पुत्र है तो
यह अश्रु न बहा।
कोई बेगाना नहीं
पोछता बाहर से आकर।
स्वयं ही उठना पड़ता है, गिर कर।

मेरी माँ को उड़ना नहीं आता था
पर हमें सुबह शाम सपनों के पंख लगाती
और अनंत अंबर में उड़ाती।
मेरी माँ को माँगना नहीं आता था
बाँटना ही जानती थी।
घर की दरारों दराज़ों में पोटलियों के भीतर
रहमतें बाँध कर छिपाए रखती।

माँ के पास कितना कुछ था।
नहीं के अलावा, और सारा कुछ।
माँ ऊड़े* को जूड़े से पहचान कर अक्सर कहती
पुत्र इसका पल्ला न छोड़ना।
यही तारनहार है।
शाम को कुसमय घर लौटने के कारण
वृद्धावस्था में भी वह
चारपाई पर लेटी लाड से
अपने पास बुलाती।
मुझे हल्के हाथ से
मेरे पुत्र पुनीत के सामने
मेरी रंगी हुई दाढ़ी पर
हल्का-सा हाथ फेरती और कहती
अब तो सुधर जा तेरा बेटा बराबर का हो गया।
यदि कल यह भी तेरी तरह करेगा
तो क्या करेगा?
आज के दिन चली गई दूर बहुत दूर
बैशाखी वाले दिन गुलगुले, मिठाई, नमकीन मट्ठियाँ
बनाती थी बड़े स्वादिष्ट।

अब जब कभी कढ़ाही चढ़ती है
सरसों का तेल खौलता है
तो बहुत याद आती है माँ।

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