मेरी दुआ है-लावा -जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar 

मेरी दुआ है-लावा -जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar

ख़ला के गहरे समुंदरों में
अगर कहीं कोई है जज़ीरा
जहाँ कोई साँस ले रहा है
जहाँ कोई दिल धड़क रहा है
जहाँ ज़ेहानत ने इल्म का जाम पी लिया है
जहाँ के बासी
ख़ला के गहरे समुंदरों में
उतारने को हैं अपने बेड़े
तलाश करने कोई जज़ीरा
जहाँ कोई साँस ले रहा है
जहाँ कोई दिल धड़क रहा है

मिरी दुआ है
कि उस जज़ीरे में रहने वालों के जिस्म का रंग
इस जज़ीरे के रहने वालों के जिस्म के जितने रंग हैं
इन से मुख़्तलिफ़ हो
बदन की हैअत भी मुख़्तलिफ़
और शक्ल-ओ-सूरत भी मुख़्तलिफ़ हो

मिरी दुआ है
अगर है उन का भी कोई मज़हब
तो इस जज़ीरे के मज़हबों से वो मुख़्तलिफ़ हो

मिरी दुआ है
कि इस जज़ीरे की सब ज़बानों से मुख़्तलिफ़ हो
ज़बान उन की

मिरी दुआ है
ख़ला के गहरे समुंदरों से गुज़र के
इक दिन
इस अजनबी नस्ल के जहाज़ी
ख़लाई बेड़े में
इस जज़ीरे तक आएँ
हम उन के मेज़बाँ हों
हम उन को हैरत से देखते हों
वो पास आ कर
हमें इशारों से ये बताएँ
कि उन से हम इतने मुख़्तलिफ़ हैं
कि उन को लगता है

इस जज़ीरे के रहने वाले
सब एक से हैं

मिरी दुआ है
कि इस जज़ीरे के रहने वाले
उस अजनबी नस्ल के कहे का यक़ीन कर लें

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