मेरा पुण्य (एण्ट्रे पुण्यम्)-जी. शंकर कुरुप-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita G. Sankara Kurup

मेरा पुण्य (एण्ट्रे पुण्यम्)-जी. शंकर कुरुप-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita G. Sankara Kurup

 

मेरा पुण्य

मेरे चिर-संचित पुंजीभूत पुण्यों की प्रतीक

मेरे चिर-संचित पुंजीभूत पुण्यों की प्रतीक
मेरी प्रिया ने मनोहर मन्द-हास के साथ मधुर स्वर में पूछा-
“आज फुलवारी जाने में इतना विलम्ब क्यों ?
क्या फूलों से उदास हो गये हो?”

पुलकित होकर
मैं ने अपने मधुर स्वप्न के दोनों हाथ ग्रहण कर उत्तर दिया-
“तारुण्य का वसन्तारम्भ हुआ है
बन्ध-विमुक्त निबिड़-कुन्तलों की भ्रमर-पंक्तियाँ डोल रही हैं,
प्रेम-सुरभिल निश्वास का मन्द पवन बह रहा है,
कुन्द कलिकाओं के रुचिर अग्र अस्पष्ट दीख रहे हैं,
मृदुल पल्लव-युगल मर्मर कर रहा है,
पाटलवर्णी रेशमी साड़ी के झूमते आँचल के पल्लव-भार से
कनक हस्तवल्लियाँ हिल रही हैं,
पाटल अपने प्रत्येक पदविन्यास में
विद्रुम बिखेर रहा है मेरे समीप,
मन्द-मन्द कूजनेवाले नूपुर पक्षी का
मंजु स्वन गूंज रहा है,
लम्बे विस्फारित नील नयनों में
प्रेम की लहरियां उठ रही हैं,
स्नेह-सुरभित प्रसूनों की चुम्बन-वर्षा
मेरे ऊपर हो रही है,
खड़ी है यों जब मेरी नन्दन-लक्ष्मी मेरे सामने
तो मैं कैसे किसी अन्य उपवन की ओर जाऊँगा।
अगर है यह अपराध
तो प्रिये इस अपराध को क्षमा करो,
मेरे मन का भौंरा तुम्हारे चारों ओर मंडरा रहा है।”

 

जब कनक-सूर्य अपनी अरुण रश्मियाँ फैलाये

 

जब कनक-सूर्य अपनी अरुण रश्मियाँ फैलाये
पास खड़ा हुआ तो
अंजनवर्ण गगन-पिंजरे में बन्द
पञ्चरंगी सारिका सन्ध्या ने
अत्यन्त आनन्द के साथ
अपने जगन्मोहन रंग-बिरंगे पंख धीरे-धीरे फैला दिये ।
मेरे चिर-संचित पुण्य की पुंजीभूत प्रतीक प्रिया ने
मन्द-हास के साथ
मुझ से मधुर स्वर में कहा-
“खिले हुए धवल मुकुलों से लदी
यह नभ-मालती
अपने भार से चारों ओर से
नीचे की ओर झुकी जा रही है
और पश्चिमी दिशा से आकर
सन्ध्या फूल चुन रही है।
खड़ी है वह अरुणारुण मदिरा लेकर
आज क्यों आप की आँखों को तृषा सूख गयी है ?”

समेटकर हाथों में गन्ध-मदिर नील अलकावलि
जो लहरा रही थी अरुण-चरण कमल पर
मैं ने उन्हें चूमा
और प्रणयाकुल दृष्टि लिये बोला-
“इस अरुणाये हुए ललाट पर
श्रम-कणिकाओं के तारे चमचमा रहे हैं,
धीमे-धीमे दोलायमान नील अलकें
रजनी के आगमन की सूचना दे रही हैं,
कर्मजाल को समेट लेनेवाले
कर्मेन्द्रिय-भारवाहकों को श्रम-मुक्ति का
आनन्द दे रही हैं,
नेह-भरी मधुर चितवन से
मेरे मन के सागर को आरक्त कर रही हैं,
नाना विकार-वीचियों का विक्षोभ पैदा करनेवाली
लम्बी-लम्बी साँसें चल रही हैं,
दे रही है नवोन्मेष
मेरे म्लान मलिन तप्त जीवन के सुमन को,
तू जब खड़ी है अत्यन्त निकट, मोहनदर्शिनी !
तो कौन क्यों किसी दूसरी सन्ध्या की खोज करेगा ?
अगर यह अपराध है,
तो क्षमा कर दो इसे प्रिये !
मेरा हृदय-घन घुमड़ रहा है तेरे चारों ओर ।”

-१९२८

 

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