मेरा इकु खिनु मनूआ रहि न सकै-गुरू राम दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Ram Das Ji

मेरा इकु खिनु मनूआ रहि न सकै-गुरू राम दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Ram Das Ji

मेरा इकु खिनु मनूआ रहि न सकै नित हरि हरि नाम रसि गीधे ॥
जिउ बारिकु रसकि परिओ थनि माता थनि काढे बिलल बिलीधे ॥१॥
गोबिंद जीउ मेरे मन तन नाम हरि बीधे ॥
वडै भागि गुरु सतिगुरु पाइआ विचि काइआ नगर हरि सीधे ॥१॥ रहाउ ॥
जन के सास सास है जेते हरि बिरहि प्रभू हरि बीधे ॥
जिउ जल कमल प्रीति अति भारी बिनु जल देखे सुकलीधे ॥२॥
जन जपिओ नामु निरंजनु नरहरि उपदेसि गुरू हरि प्रीधे ॥
जनम जनम की हउमै मलु निकसी हरि अम्रिति हरि जलि नीधे ॥३॥
हमरे करम न बिचरहु ठाकुर तुम्ह पैज रखहु अपनीधे ॥
हरि भावै सुणि बिनउ बेनती जन नानक सरणि पवीधे ॥੪॥੩॥੫॥੧੧੭੮॥

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