मेघगीत (मेघगीतम्)-जी. शंकर कुरुप-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita G. Sankara Kurup

मेघगीत (मेघगीतम्)-जी. शंकर कुरुप-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita G. Sankara Kurup

हे सविता, छाया और प्रकाश की सलील रचना कर

हे सविता,
छाया और प्रकाश की सलील रचना कर
जग को सुन्दर और विचित्र बनानेवाले,
ओस-कण में और महासागर में
समभाव से प्रतिबिम्बित होनेवाले अमल प्रकाश,
लोकचक्षु, हे स्वामिन्,
कौन कर सकता है कीर्तन
तुम्हारी गेय महिमा का ?
तुम हो सनातन, प्रकृति के प्रवर्तक!
प्रेम की डोर से बांध लिया है तुम ने
अखिल विश्व को,
तुम्हीं करते हो निर्माण काल का भी !

यह धरित्री-देवी,
विविध धातुओं के अंगरागों से अंकित
मनहर कानन-हरीतिमा के उजागर उत्तरीय से शोभित
अंगों पर बिखरे हैं सुमन
शोभित है वक्र चंचल सरिताओं की कुन्तल राशि से
उर्मिल सागर के विलुलित शिथिल वसन धारण कर
कुसुम सुरभित निश्वास के साथ
मूंद लेती है रजनी की पलकें,
कर रही है तुम्हारी शयन-प्रदक्षिणा।
हे सर्वोपास्य,
ये तारागण हैं तुम्हारे पदयुगल के पराग मात्र ।

 

मैं हूँ क्षुद्र मेघ, निरीह, और हूँ संसार का घनीभूत वाष्प,

मैं हूँ क्षुद्र मेघ, निरीह,
और हूँ संसार का घनीभूत वाष्प,
मैं तुम्हारी सृजन चातुरी का निदर्शन हूँ।
हे चित्रचेष्टित,
प्रकाश बोनेवाले अपने हाथों से ही तो
तुम ने बनाया है मेरा जीवन कालिमामय !

हे निरतिशय सनातन तेज,
मैं जडात्मक
बारम्बार रूपान्तर पाता हूँ,
अपनी तमोमय आत्मा में
दुर्वह ज्वाला लिये सर्वदा भटकता फिरता हूँ।

नहीं है मेरी इच्छा से यह,
करती है मेरी गति का परिचालन
कोई महती अदृश्य शक्ति।
उस की एक फूंक से
धीर सागर प्रकम्पित होता है,
उन्नत महाकाय पर्वत
परिवर्तित होता है लघु धूलि-कणिकाओं में ।
मैं तो लक्ष्यहीन हूँ,
इसलिए आँसू बहाता हुआ
नभ में आशावलम्बी होकर
भटक रहा हूँ ।

हे चित्रहेती भगवन् ! स्वर्गपथ से जब तू जैत्र-यात्रा करने लगता है

हे चित्रहेती भगवन् !
स्वर्गपथ से जब तू जैत्र-यात्रा करने लगता है
तब यदि मेरे हृदय के टूक-टूक होने की ध्वनि
बन सके तुम्हारा भेरी-रव,
यदि मेरे हृदय का शोणित काम आ सके
तुम्हारे हेतु तोरण बाँधने के,
मेरा श्यामल जीवन
हो सके थोड़ी देर के लिए ही सही, तुम्हारा अलंकार चिह्न,
मेरे अन्तरंग की असहनीय ज्वाला
बन जाये कांचन पताका,
मेरे दुःख की छाया
बिछा सके कालीन तेरे सुभग मग में,
मेरे आँसू छिड़का सकें गुलाब-जल,
तो मैं चाहूँगा यही
कि अगले जन्म में भी मैं मेघ ही बनूँ ।

मैं मलिन हूँ और हूँ भी नश्वर-
किन्तु इस से क्या ?
प्रोज्ज्वल गरिमा के साथ
हे देव, तुम्हारे सम्मुख
हर्ष-स्तम्भ-लज्जा आदि
विविध भावों की रंजक रंगीन छटा
कपोलों पर खिलाये,
खड़ा रह पाऊँ, और
मेरा आर्द्र वाष्पपूर्ण जीवन
जग को प्रेमाधीन करने में सफल हो ।
हे सनातन,
तुम्हारे सुप्रकाश की सुन्दरता पाकर
मेरा मन जगमगाता रहे।

-१९३०

 

Leave a Reply