मुस्तक़िल महरूमियों पर भी तो दिल माना नहीं-दर्द आशोब -अहमद फ़राज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmed Faraz,

मुस्तक़िल महरूमियों पर भी तो दिल माना नहीं-दर्द आशोब -अहमद फ़राज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmed Faraz,

मुस्तक़िल महरूमियों पर भी तो दिल माना नहीं
लाख समझाया कि उस महफ़िल में अब जाना नहीं

ख़ुदफ़रेबी ही सही, क्या कीजिए दिल का इलाज
तू नज़र फेरे तो हम समझें कि पहचाना नहीं

एक दुनिया मुंतज़िर है …और तेरी बज़्म में
इस तरह बैठें हैं हम जैसे कहीं जाना नहीं

जी में जो आती आता है कर गुज़रो कहीं ऐसा न हो
कल पशेमाँ हों कि क्यों दिल का कहा माना नहीं

ज़िन्दगी पर इससे बढ़कर तंज़ क्या होगा ‘फ़राज़’
उसका ये कहना कि तू शायर है, दीवाना नहीं

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