मुसलसल ख़िज़ां यूं छा गई है ज़िन्दगानी पर- शायरी-कृष्ण बेताब -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Krishan Betab

मुसलसल ख़िज़ां यूं छा गई है ज़िन्दगानी पर- शायरी-कृष्ण बेताब -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Krishan Betab

मुसलसल ख़िज़ां यूं छा गई है ज़िन्दगानी पर
हमेशा के लिये पर लग गये हों बहारों को
हौलनाक रात ही रात छाई है माहौल पर
शब निगल गई हो जैसे इन उजालों को

कोई झील भी तो नज़र नहीं आती अब मुझे
जिसमें गिरा दूं मैं हसद की आबशारों को
कैसे भूल जायूं मैं माजी की तलख़ियां बता
कैसे जला दूं मैं ग़म के मरगज़ारों को

ज़िन्दगी है बहती हुई दर्द की इक नहर
रवां है मंज़िल की तरफ़ फिर भी इठलाती हुई
राह में कोई भी साथी नहीं न कोई हमदर्द
है दर्द से भरपूर फिर भी इतराती हुई

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