मुसद्दस करीमा दर मुनाजात बारीएतआला- कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi 

मुसद्दस करीमा दर मुनाजात बारीएतआला- कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

सदा दिल से ऐ मोमिने पाकबाज़।
वजू करके पढ़ पंज-वक्ती नमाज।
ब वक्ते मुनाजात बा सद नियाज।
यह कह अपने हाथों को करके दराज़।

करीमा व बख़्शाए बर हाले मा।
कि हस्तम असीरे कमंदे हवा।

इलाही तू सत्तारो गफ़्फ़ार है।
मेरा यां गुनाहों का अंबार है।
न हामी कोई ना मददगार है।
अब इस बेकसी में तू ही चार है।

न दारीम गै़र अज़ तू फ़रयादरस।
तुई आशियाँ रा ख़ता बख्शो बस।

हुए जुर्म तुझ से सग़ीरो कबीर।
पड़ा है तू दामे गुनाह में असीर।
जरा ख्वाबे ग़फ़लत से चौंक ऐ ‘नजीर’।
दुआ मांग जल्द और कह ऐ ख़बीर।

निगहदार मार अज़तूराहे ख़ता।
ख़ता दर गुज़ारो सबाबम नुमा।

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