मुर्गी-अतिक्रमण_कविता संग्रह-कुमार अंबुज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Ambuj

मुर्गी-अतिक्रमण_कविता संग्रह-कुमार अंबुज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Ambuj

 

उसकी चाल में एथलीट की अकड़ और शान
गर्दन की कोमलता में गति का सौंदर्य अनुपम
इस सुबह में वह चुगती हुई दाना
कितनी संलग्न
कितनी समर्पित !
पंखों के डिजाइन का फ्रॉक पहने
वह एक किलकती हुई बच्ची
कूदती-फुदकती मोहल्ले की गलियों में
एक दूसरी मुद्रा में वह एक चिंतित स्त्री
दाना-पानी की खोज में भटकती
कभी निकली हुई सैर पर नन्हे बच्चों के साथ
अपने जीवन की छोटी-सी स्पंदित उड़ान में प्रसन्न
सचेत निहारती गोल चमकदार आँखों से दुनिया को
हर आक्रमण के खिलाफ़ सजग दौड़ से भरी हुई
उसे छूना उत्साह भरी एक थकाऊ क्रिया
इस समय वह बेपरवाह अपने ऊपर लगी
स्वाद भरी हिंसक निगाह से
लचक से झुकाती हुई ग्रीवा
कचरे के ढेर में से उठाती छिपा हुआ अन्न कण
हवा में मिलाती हुई
अपनी तरह की खास और मीठी आवाज के गुल्ले !

 

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