मुनव्वरनामा-मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Munnawarnama part 2

मुनव्वरनामा-मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Munnawarnama part 2

गिड़गिड़ाए नहीं, हाँ हम्दो सना से माँगी

गिड़गिड़ाए नहीं, हाँ हम्दो सना से माँगी
भीख भी हमने जो माँगी तो ख़ुदा से माँगी

हाथ बाँधे रहे, पलकों को झुकाए रक्‍खा
दाद भी हमने जो माँगी तो हया से माँगी

ये भी उड़ जाये जो एक चिड़िया बची है घर में
इतनी मोहलत तो बहरहाल क़ज़ा से माँगी

हम तेरे एक इशारे पे लहू रंग देते
तूने ये क्या किया सुर्ख़ी भी हिना से माँगी

तुम भी साबित हुए कमज़ोर मुनव्वर राना
ज़िन्दगी माँगी भी तुमने तो दवा से माँगी

मसनद नशीन हो के न कुर्सी पे बैठ कर

मसनद नशीन हो के न कुर्सी पे बैठ कर
गुज़रेंगे पुलसिरात से नेकी पे बैठ कर

इस अह्द में हज़ार के नोटों की कद्र है
गाँधी भी ख़ुश नहीं थे चवन्नी पे बैठकर

गेहूँ के साथ घुन को भी पिसते हुए जनाब
देखा है हमने गाँव की चक्की पे बैठ कर

बच्चे को अपने दाना भराती थी फ़ाख़्ता
माँ के समान पेड़ की टहनी पे बैठ कर

रिश्ता कबूतरों से मेरा बचपने का है
खाते थे मेरे साथ चटाई पे बैठ कर

यादों की रेल आज वहीं आ के रुक गई
खेले थे हम जहाँ कभी पटरी पे बैठकर

जिसने भी इस ख़बर को सुना सर पकड़ लिया

जिसने भी इस ख़बर को सुना सर पकड़ लिया
कल इक दिये ने आँधी का कालर पकड़ लिया

उसकी रगों में दौड़ रहा था मेरा लहू
बेटे ने बढ़ के दस्ते सितमगर पकड़ लिया

जिसकी बहादुरी के क़सीदे लिखे गए
निकला शिकार पर तो कबूतर पकड़ लिया

इक उम्र तक तो मुझको रहा तेरा इन्तिज़ार
फिर मेरी आरज़ूओं ने बिस्तर पकड़ लिया

तितली ने एहतिजाज की क़िस्मत संवार दी
भौरे ने जब कभी उसे छत पर पकड़ लिया

पठान ही नहीं यूसुफ़ ज़ई निकलता है

पठान ही नहीं यूसुफ़ ज़ई निकलता है
जिसे बखील समझिए सख़ी निकलता है

वसीला ये भी है अल्लाह तक पहुँचने का
मदद के वक़्त लबों से अली निकलता है

न जाने कितने ही पर्दे उलट के देख लिए
हर एक पर्दे के पीछे वही निकलता है

लिखा है जब मेरी क़िस्मत में लखनवी होना
तो इस्तिख़ारे में क्यों देहलवी निकलता है

हम फ़सीलों को सजा देंगे सरों से अपने

हम फ़सीलों को सजा देंगे सरों से अपने
आप शर्मिन्दा न हों नौहागरों से अपने

जिस घड़ी बाग़ में कलियों पे शबाब आता है
तितलियाँ ताली बजाती हैं परों से अपने

शेर के पेट से बकरी नहीं वापस आती
पूछिए जा के कभी जादूगरों से अपने

मज़हबी लोग सियासत में जब आ जाते हैं
फिर निकलते नहीं बच्चे भी घरों से अपने

कैफ़ियत एक सी अब दोनों तरफ़ है शायद
हम भी उकताने लगे चारागरों से अपने

तेरी महफ़िल से अगर हम न निकाले जाते

तेरी महफ़िल से अगर हम न निकाले जाते
हम तो मर जाते मगर तुझको बचा ले जाते

दबदबा बाक़ी है दुनिया में अभी तक वर्ना
लोग मिंबर से इमामों को उठा ले जाते

बेवफ़ाई ने हमें तोड़ दिया है वर्ना
गिरते पड़ते ही सही ख़ुद को संभाले जाते

हर घड़ी मौत तक़ाज़े को खड़ी रहती है
कब तलक हम उसे वादे पे टाले जाते

इस रेत के घरौंदे को बेटे, महल समझ

इस रेत के घरौंदे को बेटे, महल समझ
मैं जो भी लिख रहा हूँ उसी को ग़ज़ल समझ

बीमारियों को अपने गुनाहों में कर शुमार
ज़िन्दा है तू तो इसको दुआओं का फल समझ

उसकी तरफ़ से फूल भी आयेंगे एक रोज़
पत्थर उठा के चूम ले इसको पहल समझ

 

This Post Has One Comment

Leave a Reply