मुनव्वरनामा-मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Munnawarnama part 1

मुनव्वरनामा-मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Munnawarnama part 1

ऐसे उड़ूँ कि जाल न आए ख़ुदा करे

ऐसे उड़ूँ कि जाल न आए ख़ुदा करे
रस्ते में अस्पताल न आए ख़ुदा करे

ये मादरे वतन है, मेरा मादरे वतन
इस पर कभी ज़वाल न आए ख़ुदा करे

अब उससे दोस्ती है तो फिर दोस्ती रहे
शीशे पे कोई बाल न आए ख़ुदा करे

किसी के ज़ख्म पर चाहत से पट्टी कौन बाँधेगा

किसी के ज़ख्म पर चाहत से पट्टी कौन बाँधेगा
अगर बहनें नही होंगी तो राखी कौन बाँधेगा

जहाँ लड़की की इज़्ज़त लूटना इक खेल बन जाए
वहाँ पर ये कबूतर तेरे चिट्ठी कौन बाँधेगा

ये बाज़ारे सियासत है यहाँ ख़ुददारियाँ कैसी
सभी के हाथ में कासा है मुट्ठी कौन बाँधेगा

तुम्हारी महफ़िलों में हम बड़े बूढ़े ज़रूरी हैं
अगर हम ही नहीं होंगे तो पगड़ी कौन बाँधेगा

परेशाँ तो यहाँ पर सब हैं लेकिन तय नहीं होता
कि बिल्ली के गले में बढ़ के घंटी कौन बाँधेगा

दरबार में जब ओहदे के लिए पैरों पे अना गिर जाती है

दरबार में जब ओहदे के लिए पैरों पे अना गिर जाती है
क़ौमों के सर झुक जाते हैं चकरा के हया गिर जाती है

अब तक तो हमारी आँखों ने बस दो ही तमाशे देखे हैं
या क़ौम के रहबर गिरते हैं या लोकसभा गिर जाती है

पहले भी हथेली छोटी थी अब भी ये हथेली छोटी है
कल इससे शकर गिर जाती थी अब इससे दवा गिर जाती है

चिड़ियों के ठिकाने गिरने लगे बच्चों की किताबें उड़ने लगीं
तितली को गिराने की ज़िद में तू कितनी हवा गिर जाती है

हम जैसे फ़क़ीरों की दुनिया, दुनिया से अलग इक दुनिया है
हम जैसे ही झुकने लगते हैं, शाने से रिदा गिर जाती है

अपने बाजू पे मुक़द्दस सी इक आयत बाँधे

अपने बाजू पे मुक़द्दस सी इक आयत बाँधे
घर से निकला हूँ इमामों की ज़मानत बाँधे

कितना मुश्किल है विरासत को बचाए रखना
दर ब दर फिरता हूँ गठरी में शराफ़त बाँधे

रात के ख़्वाब की ताबीर से डर लगता है
कुछ ज़िना ज़ादे थे दस्तारे फ़ज़ीलत बाँधे

ज़िन्दगी रोज़ मुझे ले के निकल पड़ती है
अपनी मुट्ठी में कई लोगों की क़िस्मत बाँधे

हम गुनहगार सही, उनसे बहुत अच्छे हैं
जो खड़े रहते हैं दरबारों में नीयत बाँधे

हम तो उठ आए हैं उस कूचए दिलदारी से
चाहे अब जैसे भी घुंघरू ये सियासत बाँधे

माँ को इक बार नहीं आधी सदी देखा है
अपने आँचल में बुजर्गों की नसीहत बाँधे

अपने चेहरों को तबस्सुम से सजाए हुए लोग

अपने चेहरों को तबस्सुम से सजाए हुए लोग
कैसे होते हैं मुहब्बत में सताए हुए लोग

किसी महफ़िल, किसी दरबार के लायक़ न रहे
तेरे कूचे से हिक़ारत से उठाए हुए लोग

कैसे आपस में ज़मीनों के लिए लड़ते हैं
तेरी बस्ती में ये सहराओं से आए हुए लोग

शाम के वक़्त परिन्दों का पलटना घर को
अच्छे लगते हैं ये परदेश से आए हुए लोग

मेरे हालात बिगड़ने की दुआ करते हैं
ये वही सब हैं, वही मेरे बनाए हुए लोग

आ कहीं मिलते हैं हम ताकि बहारें आ जायें

आ कहीं मिलते हैं हम ताकि बहारें आ जायें
इससे पहले कि तअल्लुक़ में दरारें आ जायें

ये जो ख़ुददारी का मैला सा अँगोछा है मेरा
मैं अगर बेच दूँ इसको कई कारें आ जायें

दुश्मनी हो तो फिर ऐसी कि कोई एक रहे
या तअल्लुक़ हो तो ऐसा ही पुकारें आ जायें

ज़िन्दगी दी है तो फिर इतनी सी मोहलत दे दे
एक कम ज़र्फ़ का एहसान उतारें आ जायें

ये भी मुमकिन है उन्हीं में कहीं हम लेटे हों
तुम ठहर जाना जो रस्ते में मज़ारें आ जायें

हाय, क्या लोग थे हर शाम दुआ करते थे
लौट कर सारे परिन्दों की क़तारें आ जायें

लौट कर जैसे भी हो जाने पिदर! आ जाना

लौट कर जैसे भी हो जाने पिदर! आ जाना
ऐसी वैसी जो ख़बर सुनना तो घर आ जाना

वक़्ते रुख्सत मुझे इज्ज़त से सलामी देने
जब डुबोने लगे दरिया तो नज़र आ जाना

यह अना होती ही ऐसी है इसे क्या कीजै
आम सी बात है बेटे में असर आ जाना

मौत ख़ुद अपने ठिकाने पे बुला लेती है
हमने देखा है मियाँ च्यूँटि के पर आ जाना

आज भी उसके तसव्वुर से सुकूँ मिलता है
जैसे सहरा में कोई पेड़ नज़र आ जाना

ग़ज़ल हर अह्द में हम से सलीक़ा पूछने आई

ग़ज़ल हर अह्द में हम से सलीक़ा पूछने आई
बरेली में कहाँ मिलता है सुर्मा पूछने आई

मिला है ये सिला शायद हमें काँटों पे चलने का
कि हर ख़ुशबू हमीं से अपना शिजरा पूछने आई

मेरे लहजे की सफ़्फ़ाकी के चर्चे आम हैं इतने
कई दिन तक तो इक तलवार नुस्ख़ा पूछने आई

सुना है एक मृग नयनी ने आँखें फोड़ लीं अपनी
जब उससे मयकदे की राह दुनिया पूछने आई

मैं जब दुनिया में था तो हाल तक पूछा नहीं मेरा
मैं जब चलने लगा तो सारी दुनिया पूछने आई

बड़े सलीक़े से इक आशना के लहजे में

बड़े सलीक़े से इक आशना के लहजे में
मरज़ पुकार रहा था दवा के लहजे में

किसे ख़बर थी कि ये दिन भी देखना होगा
चराग़ बोल रहे हैं हवा के लहजे में

मैं अपने बारे में कहना ही उससे भूल गया
अजीब दर्द था उस फ़ाख़्ता के लहजे में

बस एक बार किसी से लिपट के रोई थी
लहू टपकता है अब तक हिना के लहजे में

मैं ज़िन्दगी यूँ ही चौखट पे छोड़ जाऊँगा
तुम एक बार तो बोलो वफ़ा के लहजे में

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