मुझी में ख़ुदा था-खोया हुआ सा कुछ -निदा फ़ाज़ली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nida Fazli

मुझी में ख़ुदा था-खोया हुआ सा कुछ -निदा फ़ाज़ली-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nida Fazli

मुझे याद है
मेरी बस्ती के सब पेड़
पर्वत
हवाएँ
परिन्दे
मेरे साथ रोते थे
हँसते थे

मेरे ही दुख में
दरिया किनारों पे सर को पटकते थे

मेरी ही खुशियों में
फूलों पे
शबनम के मोती चमकते थे
यहीं
सात तारों के झुरमुट में
लाशक्ल-सी
जो खुनक रोशनी थी
वहीं जुगनुओं की
चिराग़ों की
बिल्ली की आँखों की ताबिन्दगी थी

नदी मेरे अन्दर से होके गुज़रती थी
आकाश…!
आँखों का धोखा नहीं था

ये बात उन दिनों की है
जब इस ज़मीं पर
इबादतघरों की ज़रूरत नहीं थी
मुझी में
ख़ुदा था…!

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