मुक्ति (नजाथ)- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

मुक्ति (नजाथ)- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

 

गुंबद वाली एक गुलाम गरदिश वह
जिसमें
जम रही ठिठुरती छायाएँ और पिघलते शैल,
सागर को मरूस्थल की लय में बाँधकर
सन्नाटे की रात में

चिनार की टहनियों पर
उद्विग्न सोच का विस्फोट-फाटक३३

गुबंद वाली गुलाम गरदिश
कदमः जलते बुझते चिराग़ों की भभक
नजरेंः लौ में, लपटों के बीच उड़ रहे भुनगे
बढ़ी भ्रांति तो टूट पड़ी अपनी छवि पर
काले पारदर्शी पत्थर पर ही मुधमक्खी

स्वैरी फ़ौजें सीमा से लौट आई
पर रोने लगे पेड़-पौधे हर ओर
गुंबद मुझमें गूँज उठा
और भँवर नाचने लगे

चल रही साँस गुलाम गरदिश की
नहीं खुली कोई खिड़की किसी रंग महल की
न बजी कोई साँकल किसी प्रेमद्वार की
बाहर, नहीं कोई ध्वनि तरंग उठने वाली है
भीतर, नहीं कोई स्त्रोत पैरों तले फूटने वाला
धूमिल-धूमिल-सा चरखा घूम रहा है

प्रभात और दोपहर, मध्याहृ और रात
पड़ रहा कदम दर कदम
कड़ी में कड़ी अड़ रही

गुलाम गरदिश, धूमिल से धूमिल भेंटा
छनन छना छन, छनन छना छन
स्नेहहीन संगीत अरूप् मुद्र
न ‘वाक’ का सा अर्थ
न ही ‘वचुन’ का-सा आशय
छनन छना छन, छनन छना छन

ज़मीन धँसी
और ज़ाहिर हुई सुरंग
अस्तित्व रे ! सत रे ! असत पा गए !! बधाई है !
यह अधरचा, अधबीच छूटा नर्तक
कैसे बन पाता
गोदी में सोया सुखसिंचा हीरा
कैसे यह बंदी छूटता
नहीं यदि होता
इसके पाँव तले अविश्वासी यह खड्ड।

 

अनुवादक : मोहन लाल ‘आश’

 

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