मुक्तकी -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj 4

मुक्तकी -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj 4

इस शहर की हर एक सड़क गन्दी है

इस शहर की हर एक सड़क गन्दी है
सूरज की किरन भी तो यहाँ अंधी है
तू चम्पा चमेली का यहाँ ज़िक्र न कर
इस बाग़ में हर खुशबू पे पाबन्दी है।

हर गली गुनगुनाना ग़लती है

हर गली गुनगुनाना ग़लती है,
हर समय मुस्कुराना ग़लती है,
प्यार बस एक बार होता है
हर जगह सिर झुकाना ग़लती है।

याद बन-बन के कहानी लौटी

याद बन-बन के कहानी लौटी,
साँस हो-हो के बिरानी लौटी,
लौटे सब गम जो दिए दुनिया ने
किन्तु जाकर न जवानी लौटी ।

खोजने तुम को गया मठ में विकल अरमान मेरा

खोजने तुम को गया मठ में विकल अरमान मेरा,
पत्थरों पर झुक न पाया पर सरल शिशु-ध्यान मेरा,
जन-जनार्दन की चरण-रज किन्तु जब सिर पर चढ़ाई
मिल गया मुझको सहज उस धूल में भगवान मेरा।

हम उबलते हैं तो भूचाल उबल जाते हैं

हम उबलते हैं तो भूचाल उबल जाते हैं,
हम मचलते हैं तो तूफान मचल जाते हैं,
हमको कोशिश न बदलने की करो तुम भाई!
हम बदलते हैं तो इतिहास बदल जाते हैं!

नेताओं ने गांधी की क़सम तक बेची

नेताओं ने गांधी की क़सम तक बेची
कवियों ने निराला की क़लम तक बेची
मत पूछ कि इस दौर में क्या-क्या न बिका
इन्सानों ने आँखों की शरम तक बेची।

क्या कहें यार हमें यारों ने क्या-क्या समझा

क्या कहें यार हमें यारों ने क्या-क्या समझा* क़तरा समझा तो किसी ने हमें दरिया समझा* सब ने समझा हमें वैसा जिसे जैसा भाया* और जो हम थे वही तो न ज़माना समझा।*

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