मुक्तकी -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj 3

मुक्तकी -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj 3

रत्न तो लाख मिले, एक ह्रदय-धन न मिला

रत्न तो लाख मिले, एक ह्रदय-धन न मिला,
दर्द हर वक्त मिला, चैन किसी क्षण न मिला,
खोजते – खोजते ढल धूप गई जीवन की
दूसरी बार सगर लौट के बचपन न मिला।

मेरी आवाज़ में तेरी लहर मालूम होती है

मेरी आवाज़ में तेरी लहर मालूम होती है,
शबे-ग़म में उतरती-सी सहर मालूम होती है,
निगाहें चार जब से हो गईं तुझसे अरे जालिम?
मुझे मेरी नज़र तेरी नज़र मालूम होती है।

दिन जो निकला तो पुकारों ने परेशान किया

दिन जो निकला तो पुकारों ने परेशान किया!
रात आई तो सितारों ने परेशान किया,
गर्ज़ है ये कि परेशानी कभी कम न हुई
बीता पतझर तो बहारों ने परेशान किया!

सुख की ये घड़ी एक तो जी लेने दो

सुख की ये घड़ी एक तो जी लेने दो,
चादर ये फटी स्वप्न की सीं लेने दो,
ऐसी तो घटा फिर न कभी छाएगी
प्याला न सही, आँख से पी लेने दो ।

तन हो न गुनहगार यह कब मुमकिन है

तन हो न गुनहगार यह कब मुमकिन है?
मन हो न खतावार यह कब मुमकिन है?
जब रूप लजा करके उठाए घूँघट
यौवन न करे प्यार यह कब मुमक्लि है?

हर दिवस शाम में ढल जाता है

हर दिवस शाम में ढल जाता है,
हर तिमिर धूप में जल जाता है,
मेरे मन ! इस तरह न हिम्मत हार
वक्त कैसा हो, बदल जाता है।

सुख न सहचर ही, लुटेरा भी हुआ करता है

सुख न सहचर ही, लुटेरा भी हुआ करता है,
खुशी में ग़म का बसेरा भी हुआ करता है,
अपनी किस्मत की सियाही को कोसने वालो!
चाँद के साथ अंधेरा भी हुआ करता है।

Leave a Reply