मुकुल -सुभद्रा कुमारी चौहान -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Subhadra Kumari Chauhan Part 2

मुकुल -सुभद्रा कुमारी चौहान -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Subhadra Kumari Chauhan Part 2

फूल के प्रति

डाल पर के मुरझाए फूल!
हृदय में मत कर वृथा गुमान।
नहीं है सुमन कुंज में अभी
इसी से है तेरा सम्मान।

मधुप जो करते अनुनय विनय
बने तेरे चरणों के दास।
नई कलियों को खिलती देख
नहीं आवेंगे तेरे पास।

सहेगा कैसे वह अपमान?
उठेगी वृथा हृदय में शूल।
भुलावा है, मत करना गर्व
डाल पर के मुरझाए फूल।

मुरझाया फूल

यह मुरझाया हुआ फूल है,
इसका हृदय दुखाना मत।
स्वयं बिखरने वाली इसकी
पंखड़ियाँ बिखराना मत।

गुजरो अगर पास से इसके
इसे चोट पहुँचाना मत।
जीवन की अंतिम घड़ियों में
देखो, इसे रुलाना मत।

अगर हो सके तो ठंडी
बूँदें टपका देना प्यारे!
जल न जाए संतप्त-हृदय
शीतलता ला देना प्यारे!!

चलते समय

तुम मुझे पूछते हो ’जाऊँ’?
मैं क्या जवाब दूँ, तुम्हीं कहो!
’जा…’ कहते रुकती है जबान
किस मुँह से तुमसे कहूँ ’रहो’!!

सेवा करना था जहाँ मुझे
कुछ भक्ति-भाव दरसाना था।
उन कृपा-कटाक्षों का बदला
बलि होकर जहाँ चुकाना था।

मैं सदा रूठती ही आई,
प्रिय! तुम्हें न मैंने पहचाना।
वह मान बाण-सा चुभता है,
अब देख तुम्हारा यह जाना।

भ्रम

देवता थे वे, हुए दर्शन, अलौकिक रूप था।
देवता थे, मधुर सम्मोहन स्वरूप अनूप था।
देवता थे, देखते ही बन गई थी भक्त मैं।
हो गई उस रूपलीला पर अटल आसक्त मैं।

देर क्या थी? यह मनोमंदिर यहाँ तैयार था।
वे पधारे, यह अखिल जीवन बना त्यौहार था।
झाँकियों की धूम थी, जगमग हुआ संसार था।
सो गई सुख नींद में, आनंद अपरंपार था।

किंतु उठ कर देखती हूँ, अंत है जो पूर्ति थी।
मैं जिसे समझे हुए थी देवता, वह मूर्ति थी।

ठुकरा दो या प्यार करो

देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं
सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं

धूमधाम से साज-बाज से वे मंदिर में आते हैं
मुक्तामणि बहुमुल्य वस्तुऐं लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं

मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लाई
फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आई

धूप-दीप-नैवेद्य नहीं है झांकी का श्रृंगार नहीं
हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं

कैसे करूँ कीर्तन, मेरे स्वर में है माधुर्य नहीं
मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं

नहीं दान है, नहीं दक्षिणा खाली हाथ चली आई
पूजा की विधि नहीं जानती, फिर भी नाथ चली आई

पूजा और पुजापा प्रभुवर इसी पुजारिन को समझो
दान-दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो

मैं उनमत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आई हूँ
जो कुछ है, वह यही पास है, इसे चढ़ाने आई हूँ

चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो
यह तो वस्तु तुम्हारी ही है ठुकरा दो या प्यार करो

जाने दे

कठिन प्रयत्नों से सामग्री
एकत्रित कर लाई थी ।
बड़ी उमंगों से मन्दिर में,
पूजा करने आई थी ।।

पास पहुंकर देखा तो,
मन्दिर का का द्वार खुला पाया ।
हुई तपस्या सफल देव के
दर्शन का अवसर आया ।।

हर्ष और उत्साह बढ़ा, कुछ
लज्जा, कुछ संकोच हुआ ।
उत्सुकता, व्याकुलता कुछ-कुछ
कुछ सभ्रम, कुछ सोच हुआ ।।

किंतु लाज, संकोच त्यागकर
चरणों पर बलि जाऊंगी ।
चिर संचित सर्वस्व पदों पर
सादर आज चढ़ाऊँगी ।।

कह दूंगी अपने अंतर की
कुछ भी नहीं छिपाऊँगी ।
जैसी जो कूछ हूं उनकी ही
हूं, उनकी कहलाऊँगी ।।

पूरी जान साधना अपनी
मन को परमानन्द हुआ ।
किंतु बढ़ी आगे, देखा तो
मन्दिर का पट बन्द हुआ ।।

निठुर पुजारी ! यह क्या मुझ पर
तुझे न तनिक दया आई?
किया द्वार को बन्द और
मैं प्रभु को नहीं देख पाई ?

करके कृपा पुजारी, मुझको
जरा वहां तक जाने दे ।
प्रियतम के थोड़ी-सी पूजा
चरणों तक पहुँचाने दे ।।

जी भर उन्हे देख लेने दे,
जीवन सफल बनाने दे ।
खोल, खोल दे द्वार पुजारी !
मन की व्यथा मिटाने दे ।।

बहुत बड़ी आशा से आई हूं,
मत कर तू मुझे निराश ।
एक बार, बस एक बार, तू
जाने दे प्रियतम के पास।

पारितोषिक का मूल्य

मधुर-मधुर मीठे शब्दों में
मैंने गाना गाया एक ।
वे प्रसन्न हो उठे खुशी से
शाबाशी दी मुझे अनेक ।।

निश्चल मन से मैंने उनकी
की सभक्ति सादर सेवा ।
पाया मैंने कृतज्ञता
का उसी समय मीठा मेवा ।।

नवविकसित सुरभित कलियाँ ले,
मैंने रुचि से किया सिंगार ।
मेरी सुन्दरता की प्रिय ने
ली तुरन्त तस्वीर उतार ।।

हुई प्रेम-विह्वल मैं उनके
चरणों पर बलिहार गयी ।
बदले में प्रिय का चुम्बन पा
जीत गयी या हार गयी ।।

उस शाबाशी से, कृतज्ञता से,
तस्वीर खिंचाने से ।
हुई खुशी से मैं पागल-सी
प्रिय का चुम्बन पाने से ।।

घटने लगा किन्तु धीरे-
धीरे यह पागलपन मेरा ।
एक नशा था, उतर गया, हो
गया दुखी-सा मन मेरा ।।

गाना एक और गाया, अब
केवल मन बहलाने को।
सेवा-भाव लिये निकली मैं
अब जन-कष्ट मिटाने को ।।

सुन्दर खिले हुए फूलों से
किया आज भी साज-सिंगार
अखिल विश्व के लिए समेटे
अपने नन्हें उर में प्यार ।।

मैं प्रसन्न थी, पर प्रसन्नता
मेरी आज निराली थी।
मैं न आज मैं थी यह कोई
विश्व-प्रेम-मतवाली थी ।।

सेवा और श्रृंगार प्रेम से
भरा हुआ मेरा गाना ।
छिप कर सुना किसी ने
जिसका जान न पायी मैं आना ।।

सुनने वाला बोला, पर क्या
शब्द सुनाई देते थे ।
करते हुए प्रशंसा, विकसित
नेत्र दिखायी देते थे ।।

‘पहिले में यह बात न थी,
यह है बेजोड़ निराला गीत ।’
मेरी प्रसन्नता ने प्रतिध्वनि
किया कि प्यारे वह संगीत-

शाबाशी के पुरस्कार का
कोरा मूल्य चुकाती थी,
वही कमी उस पुरस्कार
की कीमत को दरशाती थी ।।

आहत की अभिलाषा

जीवन को न्यौछावर करके तुच्छ सुखों को लेखा।
अर्पण कर सब कुछ चरणों पर तुम में ही सब देखा।।

थे तुम मेरे इष्ट देवता, अधिक प्राण से प्यारे।
तन से, मन से, इस जीवन से कभी न थे तुम न्यारे।।
अपना तुमको समझ, समझती थी, हूँ सखी तुम्हारी।
तुम मुझको प्यारे हो, मैं तुम्हें प्राण से प्यारी।।

दुनिया की परवाह नहीं थी, तुम में ही थी भूली।
पाकर तुम-सा सुहृद, गर्व से फिरती थी मैं फूली।।
तुमको सुखी देखना ही था जीवन का सुख मेरा।
तुमको दुखी देखकर पाती थी मैं कष्ट घनेरा।।

‘मेरे तो गिरधर गोपाल तुम और न दूजा कोई।।’
गाते-गाते कई बार हो प्रेम-विकल हूँ रोई।।
मेरे हृदय-पटल पर अंकित है प्रिय नाम तुम्हारा।
हृदय देश पर पूर्ण रूप से है साम्राज्य तुम्हारा।।

है विराजती मन-मन्दिर में सुन्दर मूर्ति तुम्हारी।
प्रियतम की उस सौम्य मूर्ति की हूँ मैं भक्त पुजारी।।
किन्तु हाय! जब अवसर पाकर मैंने तुमको पाया।
उस नि:स्वार्थ प्रेम की पूजा को तुमने ठुकराया।।

मैं फूली फिरती थी बनकर प्रिय चरणों की चेरी।
किन्तु तुम्हारे निठुर हृदय में नहीं चाह थी मेरी।।
मेरे मन में घर कर तुमने निज अधिकार बढ़ाया।
किन्तु तुम्हारे मन में मैंने तिल भर ठौर न पाया।।

अब जीवन का ध्येय यही है तुमको सुखी बनाना।
लगी हुई सेवा में प्यारे! चरणों पर बलि जाना।।
मुझे भुला दो या ठुकरा दो, कर लो जो कुछ भावे।
लेकिन यह आशा का अंकुर नहीं सूखने पावे।।

करके कृपा कभी दे देना शीतल जल के छींटे।
अवसर पाकर वृक्ष बने यह, दे फल शायद मीठे ॥

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