मुकुल -सुभद्रा कुमारी चौहान -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Subhadra Kumari Chauhan Part 4

मुकुल -सुभद्रा कुमारी चौहान -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Subhadra Kumari Chauhan Part 4

झण्डे की इज़्ज़त में

धन्य हुई मैं आज, धन्य है
सखि सौभाग्य हमारा ।

जिसकी थी इच्छुका, मिला है
सुझे समय वह प्यारा ॥

माँ की वेदी पर बलि होने-
का शुभ अवसर आया।

जन्म सफल हो गया; आज ही
मैंने सब कुछ पाया ॥

विदा माँगती हूँ मैं सब से
लो, देखो, हूँ जाती।
क़ौमी झण्डे की इज़्ज़त में
हूँ यह शीश चढ़ाती ॥

मेरी टेक

निर्धन हों धनवान,
परिश्रम उनका धन हो।
निर्बल हों बलवान,
सत्यमय उनका मन हो।

हों स्वाधीन गुलाम,
हृदय में अपनापन हो।
इसी आन पर कर्मवीर
तेरा जीवन हो।

तो, स्वागत सौ बार
करूँ आदर से तेरा।
आ, कर दे उद्धार,
मिटे अंधेर-अंधेरा।

स्वागत

(१९२० में नागपुर में होने वाली
कांग्रेस के स्वागत में)

तेरे स्वागत को उत्सुक यह खड़ा हुआ है मध्य-प्रदेश
अर्घ्यदान दे रही नर्मदा दीपक सवयं बना दिवसेश ।।

विंधयाचल अगवानी पर है
वन-श्री चंवर डुलाती है ।
भोली-भाली जनता तेरा
अटपट स्वागत गाती है।।

आ मैया कांग्रेस हमारी आकांक्षा की प्यारी मूर्ति !
राज्यहीन राजाओं के गत वैभव की स्वाभाविक पूर्ति !!

है स्वागत की स्फूर्ति तदपि
मां ! मन में होता है कुछ सोच ।
आनन्द में घबराहट-सी है,
है उत्साह और संकोच ।।

हमें नहीं भय संगीनों का, चमक रहीं जो उनके हाथ ।
जरा नहीं डर उन तोपों का, गरज रहीं जो बल के साथ ।।

ढीठ सिपाही की हथकड़ियाँ
दमन नीति के वे कानून ।
डरा नहीं सकते हैं हमको
यद्‌यपि बहावें प्रतिदिन खून ॥

हम हिंसा का भाव त्याग कर विजयी, वीर, अशोक बने ।
काम करेंगे वही कि जिससे लोक और परलोक बने ॥

किन्तु आज स्वागत की धुन में
हमें नहीं कुछ भी परवाह ।
तुझको पाकर दीन -हीन भी
निज को समझ रहा नरनाह ॥

है इतना उत्साह कि डर है, हम उन्‍मत्त न बन जावें।
है इतना विश्वास कि भय है, हम गर्विष्ट न कहलावें ॥

इतना बल है प्रबल कहीं हम, अत्याचार न कर डालें।
यही सोच, संकोच यही, मर्यादा पार न कर डालें ॥

अत: विनय है शान्ति सहित माँ
हमको मार्ग सुझा देना।
भड़की हुई हृदय की ज्वाला
माँ ! कर प्यार बुझा देना॥

लुटे हुए दीनों की आशा, तू दासों की उज्जवल रत्न ।
भारतीय स्वातंत्र्य प्राप्ति की तू चिरजीवी सात्विक यत्न ॥

मरे हुए को अमर बनाने-
वाली तू संजीवन मन्त्र ।
प्रिय स्वराज्य-सञ्चालन को
एकमात्र तू जीवित यन्त्र॥

—–

गरदन कटी हमारी रण में
पड़ा हमारा ही हथियार।
पर मालिक बन गये और ही
दिया दासता का उपहार॥

ऐसे समय सहारा तेरा है बच्चों की यही पुकार।
कर ये दूर धाक धमकी के नौकरशाही के अधिकार ॥

वायु बहे स्वच्छन्द भारती,
भारत का फूले उद्यान।
नव वसन्‍त के साथ भारती
देखे भारत का उत्थान॥

आयी हो वरदायिनि ! आओ, आओ-आओ बारम्बार ।
त्रुटियों की कुटिया प्रस्तुत है और तुम्हारा है अधिकार ॥

इस कुटिया को महल समझना
हम हैं बालक अज्ञानी ।
पूजा को तैयार खड़े हें,
स्वागत ! आओ महरानी !!

स्वदेश के प्रति

आ, स्वतंत्र प्यारे स्वदेश आ,
स्वागत करती हूँ तेरा।
तुझे देखकर आज हो रहा,
दूना प्रमुदित मन मेरा।

आ, उस बालक के समान
जो है गुरुता का अधिकारी।
आ, उस युवक-वीर सा जिसको
विपदाएं ही हैं प्यारी।

आ, उस सेवक के समान तू
विनय-शील अनुगामी सा।
अथवा आ तू युद्ध-क्षेत्र में
कीर्ति-ध्वजा का स्वामी सा।

आशा की सूखी लतिकाएं
तुझको पा, फिर लहराईं।
अत्याचारी की कृतियों को
निर्भयता से दरसाईं।

 

विदा

“गिरफ़्तार होने वाले हैँ,
आता है वारन्ट अभी !”
धक-सा हुआ हृदय, मैं सहमी
हुए विकल साशंक सभी ॥

किन्तु सामने दीख पड़े
मुस्कुरा रहे थे खड़े-खड़े।
रुके नहीं, आँखों से आँसू
सहसा टपके बड़े-बड़े॥

‘‘पगली, यों ही दूर करेगी
माता का यह रौरव कष्ट?’’
रुका वेग भावों का, दीखा
अहा ! मुझे यह गौरव स्पष्ट॥

तिलक, लाजपत, श्री गांधीजी
गिरफ़्तार बहुबार हुए।
जेल गये, जनता ने पूजा,
संकट में अवतार हुए॥

जेल! हमारे मनमोहन के
प्यारे पावन जन्म-स्थान।
तुझको सदा तीर्थ मानेगा
कृष्ण-भक्त यह हिन्दुस्तान॥

मैं प्रफुल्ल हो उठी कि आहा!
आज गिरफ़्तारी होगी।
फिर जी धड़का, क्या भैया की
सचमुच तैयारी होगी!!

आँसू छलके, याद आ गयी,
राजपूत की वह बाला।
जिसने विदा किया भाई को
देकर तिलक और भाला॥

सदियों सोयी हुई वीरता
जागी, मैं भी वीर बनी।
जाओ भैया, विदा तुम्हें
करती हूँ मैं गम्भीर बनी॥

याद भूल जाना मेरी
उस आँसू वाली मुद्रा की।
कीजे यह स्वीकार बधाई
छोटी बहिन ‘सुभद्रा’ की॥

मातृ-मन्दिर में

देव ! वे कुंजें उजड़ी पड़ीं
और वह कोकिल उड़ ही गयी ।
हटायीं हमने लाखों बार
किन्तु घड़ियां जुड़ ही गयीं ।।

विष्णु ने दिया दान ले लिया
कुश्लता गयी, अंधेरा मिला ।
मातृ-मन्दिर में सूने खड़े
मुक्ति के बदले मरना मिला ।।

आह की कठिन लूह चल रही
नाश का घन-गर्जन हो रहा ।
बूंद या बाण बरसने लगे
पापियों से तर्जन हो रहा ।

अमर-लोचन के धन को लिये
चलो, चल पड़ें, खुले हैं द्वार ।
गर्ज का कुश्लाम्बर ले चलें
मातृ-मन्दिर से हुई पुकार ।।

जननि के दुख की घड़ियां कटें
सजावें पूजा का साहित्य ।
आरती उतरे आदर-भरी
करों में लें नभ का आदित्य ।।

आज वे सन्देशे सुन पड़ें
कटे पद-कंजों की जंजीर ।
मुक्ति की मतवाली मां उठे
उठावें बेटी-बेटे वीर ।।

पाप पृथ्वी से उठ जाय
पापियों से टूटे सम्बन्ध।
प्यार, प्रतिभा, प्राणों की उठे
त्यागमय शीतल-मंद-सुगंध ।।

विजयिनी मां के वीर सुपुत्र
पाप से असहयोग लें ठान ।
गुंजा डालें स्वराज्य की तान
और सब हो जावें बलिदान ।।

जरा ये लेखनियां उठ पड़ें
मातृ-भूमि को गौरव से मढ़ें ।
करोड़ों क्रांतिकारिणि मूर्ति
पलों में निर्भयता से गढ़ें ।।

हमारी प्रतिभा साध्वी रहे
देश के चरणों पर ही चढ़े ।
अहिंसा के भावों में मस्त
आज यह विश्व जोतना पड़े ।।

मत जाओ

यों असहाय छोड़ कर असमय
कैसे जाते हो भगवान ?
लौटो, तुम्हें न जाने देंगे,
दुखी देश के जीवन-प्राण !

भारत मैया की नैया के
चतुर खेवैया लौट चलो ।
इस कुसमय में साथ न छोड़ो,
रुक जाओ, ठहरो, सुन लो ।।

आशा-बेलि स्वदेश-भूमि की
यों न हाय ! मुर्झाने दो !

लौटो, लौटो, भारत के घन !
उसे ज़रा हरियाने दो॥

जननि निछावर होगी तुमपर
जनता वलि – वलि जावेगी ।
श्रद्धा और प्रीति से तुमको
नयनों में बिठलावेगी॥

लौटो, आओ, मदराले में
मन्दिर हम बनवा देंगे।
यहाँ हथकड़ी और बेड़ियाँ-
का घण्टा टंगवा देंगे॥

तुम बन जाना प्रमुख पुजारी
करते रहना नित टंकार ।
हम सब मिलकर करें प्रार्थना
हो स्वराज्य का मन्त्रोचार ॥

तब स्वतंत्रता देवी देगी
प्रमुदित हो प्यारा वरदान ।
यह पहिनो जयमाल गले में

विजई मयूर

तू गरजा, गरज भयंकर थी,
कुछ नहीं सुनाई देता था।
घनघोर घटाएं काली थीं,
पथ नहीं दिखाई देता था।

तूने पुकार की जोरों की,
वह चमका, गुस्से में आया।
तेरी आहों के बदले में,
उसने पत्थर-दल बरसाया।

तेरा पुकारना नहीं रुका,
तू डरा न उसकी मारों से।
आखिर को पत्थर पिघल गए,
आहों से और पुकारों से।

तू धन्य हुआ, हम सुखी हुए,
सुंदर नीला आकाश मिला।
चंद्रमा चाँदनी सहित मिला,
सूरज भी मिला, प्रकाश मिला।

विजई मयूर जब कूक उठे,
घन स्वयं आत्मदानी होंगे।
उपहार बनेंगे वे प्रहार,
पत्थर पानी-पानी होंगे।

जलियाँवाला बाग में बसंत

(जलियाँवाला बाग की घटना बैसाखी को घटी थी,
बैसाखी वसंत से सम्बंधित महीनों (फाल्गुन और चैत्र)
के अगले दिन ही आती है)

यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।

कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।

परिमल-हीन पराग दाग सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।

ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना।

वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना,
दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना।

कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें,
भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें।

लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,
तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले।

किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना,
स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना।

कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर,
कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर।

आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं।

कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना,
कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना।

तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर,
शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर।

यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना,
यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।

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