मुकरियाँ-त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 2

मुकरियाँ-त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 2

मैं झूमूँ तो वह भी झूमे।
जब चाहे गालों को चूमे।
खुश होकर नाचूँ दे ठुमका।
क्या सखि साजन ? ना सखि झुमका। 7

वह सुख की डुगडुगी बजाये।
तरह तरह से मन बहलाये।
होती भीड़ इकट्ठी भारी ।
क्या सखि साजन ? नहीं, मदारी। 8

जब आये, रस-रंग बरसाये ।
बार बार मन को हरसाये ।
चलती रहती हँसी – ठिठोली।
क्या सखि साजन ? ना सखि, होली । 9

मेरी गति पर खुश हो घूमे ।
झूमे, जब जब लहँगा झूमे ।
मन को भाये, हाय , अनाड़ी ।
क्या सखि, साजन ? ना सखि साड़ी । 10

बिना बुलाये , घर आ जाता ।
अपनी धुन में गीत सुनाता ।
नहीं जानता ढाई अक्षर ।
क्या सखि, साजन ? ना सखि, मच्छर । 11

Leave a Reply