मुकरियाँ-त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 1

मुकरियाँ-त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 1

 

जब देखूं तब मन हरसाये ।
मन को भावों से भर जाये ।
चूमूँ, कभी लगाऊँ छाती ।
क्या सखि साजन ? ना सखि पाती।। 1

रातों में सुख से भर देता ।
दिन में नहीं कभी सुधि लेता ।
फिर भी मुझे बहुत ही प्यारा ।
क्या सखि साजन ? ना सखि तारा । 2

मुझे देखकर लाड़ लड़ाये।
मेरी बातों को दोहराये।
मन में मीठे सपने बोता।
क्या सखि साजन ? ना सखि तोता । 3

सबके सन्मुख मान बढ़ाये।
गले लिपटकर सुख पंहुचाये।
मुझ पर जैसे जादू डाला ।
क्या सखि साजन ? ना सखि माला । 4

जब आये तब खुशियाँ लाता।
मुझको अपने पास बुलाता ।
लगती मधुर मिलन की बेला।
क्या सखि साजन ? ना सखि मेला। 5

पाकर उसे फिरूँ इतराती।
जो मन चाहे सो मैं पाती।
सहज नशा होता अलबत्ता ।
क्या सखि साजन ? ना सखि सत्ता । 6

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