मिसाल इसकी कहाँ है कोई ज़माने में-लावा -जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar 

मिसाल इसकी कहाँ है कोई ज़माने में-लावा -जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar

मिसाल इसकी कहाँ है कोई ज़माने में
कि सारे खोने के ग़म पाए हमने पाने में

वो शक्ल पिघली तो हर शय में ढल गई जैसे
अजीब बात हुई है उसे भुलाने में

जो मुंतिज़र न मिला वो तो हम हैं शर्मिंदा
कि हमने देर लगा दी पलटके आने में

लतीफ़ था वो तख़य्युल से, ख्वाब से नाज़ुक
गँवा दिया उसे हमने ही आज़माने में

समझ लिया था कभी इक सराब को दरिया
पर इक सुकून था हमको फ़रेब खाने में

झुका दरख़्त हवा से, तो आँधियों ने कहा
ज़्यादा फ़र्क़ नहीं झुकने-टूट जाने में

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