मिलन यामिनी -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 1

मिलन यामिनी -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 1

पूर्व भाग 1

चाँदनी फैली गगन में, चाह मन में

चाँदनी फैली गगन में, चाह मन में।

दिवस में सबके लिए बस एक जग है
रात में हर एक की दुनिया अलग है,
कल्‍पना करने लगी अब राह मन में;
चाँदनी फैली गगन में, चाह मन में।

भूमि के उर तप्‍त करता चंद्र शीतल
व्‍योम की छाती जुड़ाती रश्मि कोमल,
किंतु भरतीं भवनाएँ दाह मन में;
चाँदनी फैली गगन में, चाह मन में।

कुछ अँधेरा, कुछ उजाला, क्‍या समा है!
कुछ करो, इस चाँदनी में सब क्षमा है;
किंतु बैठा मैं सँजोए आह मन में;
चाँदनी फैली गगन में, चाह मन में।

चाँद निखरा, चंद्रिका निखरी हुई है,
भूमि से आकाश तक बिखरी हुई है,
काश मैं भी यों बिखर सकता भुवन में;
चाँदनी फैली गगन में, चाह मन में।

प्यार की असमर्थता कितनी करुण है

प्यार की असमर्थता कितनी करुण है ।

चाँद कितनी दूर है, वह जानता है,
और अपनी हद्द भी पहचानता है,
हाथ इसपर भी उठाता ही वरुण है ;
प्यार की असमर्थता कितनी करुण है ।

सृष्टि के पहले दिवस से यत्न जारी,
दूर उतनी ही निशा की श्याम सारी,
किंतु पीछा ही किए जाता अरुण है;
प्यार की असमर्थता कितनी करुण है ।

कट गए शत कल्प अपलक नेत्र खोले,
कौन आया ? सुन इसे नक्षत्र बोले,
भावना तो सर्वदा रहती तरुण है;
प्यार की असमर्थता कितनी करुण है ।

जो असंभव है उसीपर आँख मेरी,
चाहती होना अमर मृत राख मेरी,
प्यास की साँसें बचीं, बस यह शकुन है;
प्यार की असमर्थता कितनी करुण है ।

मैं कहाँ पर, रागिनी मेरी कहाँ पर

मैं कहाँ पर, रागिनी मेरी कहाँ पर!

है मुझे संसार बाँधे, काल बाँधे,
है मुझे जंजीर औ’ जंजाल बाँधे,
किंतु मेरी कल्‍पना के मुक्‍त पर-स्‍वर;
मैं कहाँ पर, रागिनी मेरी कहाँ पर!

धूलि के कण शीश पर मेरे चढ़े हैं,
अंक ही कुछ भाल के कुछ ऐसे गढ़े हैं
किंतु मेरी भावना से बद्ध अंबर;
मैं कहाँ पर, रागिनी मेरी कहाँ पर!

मैं कुसुम को प्‍यार कर सकता नहीं हूँ,
मैं काली पर हाथ धर सकता नहीं हूँ,
किंतु मेरी वासना तृण-तृण निछावर;
मैं कहाँ पर, रागिनी मेरी कहाँ पर!

मूक हूँ, जब साध है सागर उँडेलूँ,
मूर्तिजड़, जब मन लहर के साथ खेलूँ,
किंतु मेरी रागिनी निर्बंध निर्झर;
मैं कहाँ पर, रागिनी मेरी कहाँ पर!

प्राण, मेरा गीत दीपक-सा जला है

प्राण, मेरा गीत दीपक-सा जला है।

पाँव के नीचे पड़ी जो धूलि बिखरी,
मूर्ति बनकर ज्योति की किस भाँति निखरी,
आँसुओं में रात-दिन अंतर गला है;
प्राण, मेरा गीत दीपक-सा जला है।

यह जगत की ठोकरें खाकर न टूटा,
यह समय की आँच से निकला अनूठा,
यह हृदय के स्नेह साँचे में ढला है;
प्राण, मेरा गीत दीपक-सा जला है।

आह मेरी थी कि अंबर कंप रहा था,
अश्रु मेरे थे कि तारा झंप रहा था,
यह प्रलय के मेघ-मारुत में पला है;
प्राण, मेरा गीत दीपक-सा जला है।

जो कभी उंचास झोंकों से लड़ा था,
जो कभी तम को चुनौती दे खड़ा था,
वह तुम्हारी आरती करने चला है;
प्राण, मेरा गीत दीपक-सा जला है।

आज आँखों में प्रतीक्षा फिर भरो तो

आज आँखों में प्रतीक्षा फिर भरो तो ।

देखना किस ओर झुकता है ज़माना,
गूँजता संसार में किसका तराना,
प्राण, मेरी ओर पल भर तुम ढरो तो;
आज आँखों में प्रतीक्षा फिर भरो तो ।

मैं बताऊँ, शक्ति है कितनी पगों में ?
मैं बताऊँ, नाप क्या सकता दृगों में ?-
पंथ में कुछ ध्येय मेरे तुम धरो तो;
आज आँखों में प्रतीक्षा फिर भरो तो ।

चीर वन-घन, भेद मरु जलहीन आऊँ,
सात सागर सामने हों, तैर जाऊँ,
तुम तनिक संकेत नयनों से करो तो;
आज आँखों में प्रतीक्षा फिर भरो तो ।

राह अपनी मैं स्वयं पहचान लूँगा,
लालिमा उठती किधर से जान लूँगा,
कालिमा मेरे दृगों की तुम हरो तो;
आज आँखों में प्रतीक्षा फिर भरो तो ।

आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ

आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।

है कहाँ वह आग जो मुझको जलाए,
है कहाँ वह ज्वाल मेरे पास आए,
रागिनी, तुम आज दीपक राग गाओ;
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।

तुम नई आभा नहीं मुझमें भरोगी,
नव विभा में स्नान तुम भी तो करोगी,
आज तुम मुझको जगाकर जगमगाओ;
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।

मैं तपोमय ज्योती की, पर प्यास मुझको,
है प्रणय की शक्ति पर विश्वास मुझको,
स्नेह की दो बूंदे भी तो तुम गिराओ;
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।

कल तिमिर को भेद मैं आगे बढूंगा,
कल प्रलय की आंधियों से मैं लडूंगा,
किन्तु आज मुझको आंचल से बचाओ;
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।

आज मन-वीणा, प्रिये, फिर कसो तो

आज मन-वीणा, प्रिये, फिर कसो तो।

मैं नहीं पिछली अभी झंकार भूला,
मैं नहीं पहले दिनों का प्‍यार भूला,
गोद में ले, मोद से मुझको लसो तो;
आज मन-वीणा, प्रिये, फिर कसो तो।

हाथ धर दो, मैं नया वरदान पाऊँ,
फूँक दो, बिछुड़े हुए मैं प्राण,
स्‍वर्ग का उल्‍लास, पर भर तुम हँसो तो;
आज मन-वीणा, प्रिये, फिर कसो तो।

मौन के भी कंठ में मैं स्‍वर भरूँगा,
एक दुनिया ही नई मुखरित करूँगा,
तुम अकेली आज अंतर में बसो तो;
आज मन-वीणा, प्रिये, फिर कसो तो।

रात भागेगी, सुनहरा प्रात होगा,
जग उषा-मुसकान-मधु से स्‍नात होगा,
तेज शर बन तुम तिमिर घन में धँसो तो;
आज मन-वीणा, प्रिये, फिर कसो तो।

बाँध दो बिखरे सुरों को गान में तुम

बाँध दो बिखरे सुरों को गान में तुम।

गीत ठुकराया हुआ, उच्छ्वास-क्रंदन,
मधु मलय होता उपेक्षित हो प्रभंजन,
बाँध दो तूफान को मुसकान में तुम;
बाँध दो बिखरे सुरों को गान में तुम।

कल्पनाएँ आज पगलाई हुई हैं,
भावनाएँ आज भरमाई हुई हैं,
बाँध दो उनको करुण आह्वान में तुम;
बाँध दो बिखरे सुरों को गान में तुम।

व्यर्थ कोई भाग जीवन का नहीं हैं,
व्यर्थ कोई राग जीवन का नहीं हैं,
बाँध दो सबको सुरीली तान में तुम;
बाँध दो बिखरे सुरों को गान में तुम।

मैं कलह को प्रीति सिखलाने चला था,
प्रीति ने मेरे हृदय को छला था,
बाँध दो आशा पुन: मन-प्राण में तुम;
बाँध दो बिखरे सुरों को गान में तुम।

आज आओ चाँदनी में स्नान कर लो

आज आओ चाँदनी में स्नान कर लो।

तापमय दिन में सदा जगती रही है,
रात भी जिसके लिए तपती रही है,
प्राण, उसकी पीर का अनुमान कर लो;
आज आओ चाँदनी में स्नान कर लो।

चाँद से उन्माद टूटा पड़ रहा है,
लो, खुशी का गीत फूटा पड़ रहा है,
प्राण, तुम भी एक सुख की तान भर लो;
आज आओ चाँदनी में स्नान कर लो।

धार अमृत की गगन से आ रही है,
प्यार की छाती उमड़ती जा रही है,
आज, लो, मादक सुधा का पान कर लो;
आज आओ चाँदनी में स्नान कर लो।

अब तुम्हें डर-लाज किससे लग रही है,
आँखें केवल प्यार की अब जग रही है,
मैं मनाना जानता हूँ, मान कर लो;
आज आओ चाँदनी में स्नान कर लो।

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