मिलन यामिनी -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 5

मिलन यामिनी -हरिवंशराय बच्चन  -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By  Harivansh Rai Bachchan  Part 5

उत्तर भाग 1

कुदिन लगा, सरोजिनी सजा न सर

कुदिन लगा, सरोजिनी सजा न सर,
सुदिन भगा, न कंज पर ठहर भ्रमर,
अनय जगा, न रस विमुग्‍ध अधर,
—सदैव स्‍नेह
के लिए
विफल हृदय!

कटक चला, निकुंज में हवा न चला,
नगर हिला, न फूल-फूल पर मचल,
ग़दर हुया, सुरभि समीर से न रल,
—सदैव मस्‍त
चाल से
चला प्रणय!

समर छिड़ा, न आज बोल, कोकिला,
क़हत पड़ा, न कंठ खोल कोकिला,
प्रलय खड़ा, न कर ठठोल कोकिला,
—सदैव प्रीति-
गीत के
लिए समय!

सुवर्ण मेघ युक्त पच्छिमी गगन

सुवर्ण मेघ युक्त पच्छिमी गगन,
विषाद से विमुक्त पच्छिमी गगन,
प्रसाद से प्रबुद्ध पच्छिमी हवा,
धरा सजग
अतीत को
बिसार फिर !

न ग्रीष्म के उसाँस का पता कहीं,
न अश्रुसिक्त वृक्ष औ’ लता कहीं,
न प्राणहीन हो कहीं थमी हवा,
निशा रही
स्वरूप को
संवार फिर !

मयँक-रश्मि पूर्व से लहक रही,
असुप्त नीड़-वासिनी चहक रही,
शरद प्रफुल्ल मल्लिका महक रही,
दहक रहा
बुझा हआ
अँगार फिर !

निशा, मगर बिना निशा सिंगार के

निशा, मगर बिना निशा सिंगार के,
नखत थकिन अनिंद्र नभ निहार के,
क्षितिज-परिधि निराश, कालिमामयी,
परंतु
आसमान
इंतज़ार में!

घड़ी हरेक वर्ष-सी बड़ी हुई,
निशा पहाड़ की तरह खड़ी हुई,
नछत्र-माल चाल भूल-सी गई,
परंतु
कब थकान
इंतज़ार में!

प्रभात-भाल-चंद्र पूर्व में उगा,
प्रभात-बालचंद्र पूर्व में उगा,
प्रभान-लालचंद्र पूर्व में उगा,
परंतु
सुख महान
इंतज़ार में!

दिवस गया विवश थका हुआ शिथिल

दिवस गया विवश थका हुआ शिथिल,
तिमिरमयी हुई वसुंधरा निखिल,
ज़मीन-आसमान में दिए जले,
मगर जगत
हुआ नहीं
प्रकाशमय !

सभी तरफ़ विभा बिखर गई तरुण,
कलित-ललित हुआ, सभी कलुष-करुण,
किसी समय बुझे हुए दिए जले,
किन्हीं नयन
प्रदीप में
जगा प्रणय!

चढ़ा मुंडेर मुर्ग़ सिर उठा रहा,
पुकार बारबार यह बता रहा,
सुभग, सजग, सजीव प्रात आ रहा;
नई नज़र,
नई लहर,
नया समय !

शिशिर समीर वन झकोर कर गया

शिशिर समीर वन झकोर कर गया,
सिंगार वृक्ष-वेलि का किधर गया,
ज़मीन पीत पत्र-पुंज से भरी;
प्रकृति खड़ी
हुई, ठगी
हुई, अचित !

उठी पुकार एक शांति भंग कर,
उठा गगन सिहर, उठी अवनि सिहर,
‘बिसार दो विषाद की गई घड़ी;’
प्रकृति खड़ी
हुई, जगी
हुई, भ्रमित !

शिशिर समीर बन गया मलय पवन,
नवीन गीत-प्राण से गुंजा गगन,
नवीन रक्त-राग से रंजी अवनि,
प्रकृति खड़ी
सुरस पगी,
सुअंकुरित !

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