मिथ्या-बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh

मिथ्या-बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh

 

यह मुख निर्मल नहीं
मिथ्या लगी इस पर
अच्छा नहीं पास में
जाना तुम्हारे अभी
तुम तो स्नेही सुदक्षिणा
मेघमय धार उतर आती
आज भी आँखों के जल से तुम्हारे
रुद्ध देश भर जाता पुण्य से।

फिर भी मैं दूर चला जाता
यह मुख निर्मल नहीं,
बोधहीन पीला शरीर
जाता थम, तापीं
तुमने दिया बहुत कुछ
मेरा तो समस्त ही
देना अभी बाक़ी।

(तापीं : तपस्विनी)

 

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