मिठा करि कै खाइआ-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

मिठा करि कै खाइआ-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

मिठा करि कै खाइआ कउड़ा उपजिआ सादु ॥
भाई मीत सुरिद कीए बिखिआ रचिआ बादु ॥
जांदे बिलम न होवई विणु नावै बिसमादु ॥१॥
मेरे मन सतगुर की सेवा लागु ॥
जो दीसै सो विणसणा मन की मति तिआगु ॥१॥ रहाउ ॥
जिउ कूकरु हरकाइआ धावै दह दिस जाइ ॥
लोभी जंतु न जाणई भखु अभखु सभ खाइ ॥
काम क्रोध मदि बिआपिआ फिरि फिरि जोनी पाइ ॥२॥
माइआ जालु पसारिआ भीतरि चोग बणाइ ॥
त्रिसना पंखी फासिआ निकसु न पाए माइ ॥
जिनि कीता तिसहि न जाणई फिरि फिरि आवै जाइ ॥३॥
अनिक प्रकारी मोहिआ बहु बिधि इहु संसारु ॥
जिस नो रखै सो रहै सम्रिथु पुरखु अपारु ॥
हरि जन हरि लिव उधरे नानक सद बलिहारु ॥4॥21॥91॥50॥

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