माहिया छंद (टप्पे)-कविता-परमजीत कौर रीत-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Paramjeet Kaur Reet

माहिया छंद (टप्पे)-कविता-परमजीत कौर रीत-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Paramjeet Kaur Reet

कठपुतली क्या बोले
डोरी खींचे जब
ऊपर वाला हौले

जो श्वास खजाना है
क्या तेरा मेरा
इक दिन लुट जाना है

हैं लेख लकीरों के
मिलन-बिछड़ जाना
सौदे तकदीरों के

सुख के, दिन-रातों में
पंख लगें बीते
जीवन बस बातों में

दुख के हालातों में
पल-पल भी भारी
लगता दिन-रातों में

क्या मौज फकीरी की
सरल हवाओं को
कब फिक्र असीरी की

मन का ताना-बाना
चिंता तागे में
उलझाये मत जाना

खामोशी है कहती
बन यादें सावन
आँखों से है बहती

वो आँगन, फूलों की
याद सदा आये
बाबुल-घर झूलों की

मैया की बाहों को
भूल नहीं पाये
माँ-तकना राहों को

खोना क्या, क्या पाना
जीना अपनों बिन
क्या जीना, मर जाना

नदिया सा मन रखना
रज या कंकर हो
हँस-हँसकर सब चखना

नित रूप बदलता है
वक्त के पहिये पे
किसका वश चलता है

कूजागर जाने है
दीपक जीवन में
क्या ठेस मायने है

कूजे पर आन तने
कूजागर हाथों
डोरी तलवार बने

अहसासों के मोती
मन-आँखें-सीपी
धर-धर कर हँस-रोती

मुस्कान बताये हैं
घर में अच्छे दिन
अब वापस आये हैं

है फूल कि चेहरा है
रंग गुलाबों का
गालों पर ठहरा है

पल खुशियों के चुनकर
लाल-गुलाबी दूँ
घर-गुलदस्ते में भर

घर-बार सजाना है
फूल बहाना हैं
पि रूठे मनाना है

गुनगुन से चहका है
आहट है किसकी
घर महका-महका है

 

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