माहा माह मुमारखी चड़िआ सदा बसंतु-शब्द -गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

माहा माह मुमारखी चड़िआ सदा बसंतु-शब्द -गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

माहा माह मुमारखी चड़िआ सदा बसंतु ॥
परफड़ु चित समालि सोइ सदा सदा गोबिंदु ॥१॥
भोलिआ हउमै सुरति विसारि ॥
हउमै मारि बीचारि मन गुण विचि गुणु लै सारि ॥१॥ रहाउ ॥
करम पेडु साखा हरी धरमु फुलु फलु गिआनु ॥
पत परापति छाव घणी चूका मन अभिमानु ॥२॥
अखी कुदरति कंनी बाणी मुखि आखणु सचु नामु ॥
पति का धनु पूरा होआ लागा सहजि धिआनु ॥३॥
माहा रुती आवणा वेखहु करम कमाइ ॥
नानक हरे न सूकही जि गुरमुखि रहे समाइ ॥४॥१॥(1168)॥

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