मा’बूद-दर्द आशोब -अहमद फ़राज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmed Faraz,

मा’बूद-दर्द आशोब -अहमद फ़राज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmed Faraz,

बहुत हसीन हैं तेरी अक़ीदतों के गुलाब
हसीनतर है मगर हर गुले-ख़याल तिरा
हर एक दर्द के रिश्ते में मुंसलिक दोनों
तुझे अज़ीज़ मिरा फ़न , मुझे जमाल तिरा

मगर तुझे नहीं मालूम क़ुर्बतों के अलम
तिरी निगाह मुझे फ़ासलों से चाहती है
तुझे ख़बर नहीं शायद कि ख़िल्वतों में मिरी
लहू उगलती हुई ज़िन्दगी कराहती है

तुझे ख़बर नहीं शायद कि हम वहाँ हैं जहाँ
ये फ़न नहीं है अज़ीयत है ज़िंदगी भर की
यहाँ गुलू-ए-जुनूँ पर कमंद पड़ती है
यहाँ क़लम की ज़बाँ पर है नोंक ख़ंज़र की

हम उस क़बील-ए-वहशी के देवता हैं कि जो
पुजारियों की अक़ीदत से फूल जाते हैं
और एक रात के मा’बूद सुब्ह होते ही
वफ़ा-परस्त सलीबों पे झूल जाते हैं

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