माना कि रंग रंग तिरा पैरहन भी है-ग़ज़लें(तन्हा सफ़र की रात)-जाँ निसार अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaan Nisar Akhtar

माना कि रंग रंग तिरा पैरहन भी है-ग़ज़लें(तन्हा सफ़र की रात)-जाँ निसार अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaan Nisar Akhtar

माना कि रंग रंग तिरा पैरहन भी है
पर इस में कुछ करिश्मा-ए-अक्स-ए-बदन भी है

अक़्ल-ए-मआश ओ हिकमत-ए-दुनिया के बावजूद
हम को अज़ीज़ इश्क़ का दीवाना-पन भी है

मुतरिब भी तू नदीम भी तू साक़िया भी तू
तू जान-ए-अंजुमन ही नहीं अंजुमन भी है

बाज़ू छुआ जो तू ने तो उस दिन खुला ये राज़
तू सिर्फ़ रंग-ओ-बू ही नहीं है बदन भी है

ये दौर किस तरह से कटेगा पहाड़ सा
यारो बताओ हम में कोई कोहकन भी है

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