मानसर पर जउ बैठाईऐ ले जाय बग-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

मानसर पर जउ बैठाईऐ ले जाय बग-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

मानसर पर जउ बैठाईऐ ले जाय बग
मुकता अमोल तजि मीठ बीनि खात है ।
असथन पान करबे कउ जउ लगाईऐ जोक
पियतन पै लै लोहू अचए अघात है ।
परमसुगंध परि माखी न रहत राखी
महादुरगंध परि बेगि चलि जात है ।
जैसे गज मजन के डारत है छारु सिरि
संतन कै दोखी संत संगु न सुहात है ॥३३२॥

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