मानवता खड़ी है कफ़न ओढ़े-कविता -दीपक सिंह-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Deepak Singh

मानवता खड़ी है कफ़न ओढ़े-कविता -दीपक सिंह-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Deepak Singh

 

मानवता खड़ी है कफ़न ओढ़े, जाग जाये तो हम हैं।।
तुम्ही तुम हो हमी हम है न तुम हम हो न‌ हम तुम है।।

इंसान जब है हारता, परिणाम है निकालता।
विज्ञान जब है हारता, ईश्वर को है मानता।
अब जो समर‌ है हम, सबको लड़ना होगा।
मृत्यु जो है बढ़ रही, उसको कुचलना होगा।

हर ओर‌ है मौत खड़ी जीत जाये तो हम हैं।
तुम्ही तुम हो हमी हम है न तुम हम हो न‌ हम तुम है।।

विश्व के विज्ञान को भी मात दे गया।
करोड़ों जान लेकर भी आधात दे गया।।
शंकर सा सहज कौन विष को पान करें।
इसे मिटाने हेतु कौन बाणो का संधान करे।।

चलो हमीं अर्जुन बने कंधा मिलाये तो हम हैं।
तुम्ही तुम हो हमी हम है न तुम हम हो न‌ हम तुम है।।

घुट गयी है सांस जो कौन परिमुक्त कहेगा।
है भयानक हर दिन जो एक वक्त थमेगा।
माना जन्म पर मृत्यु तय है जो इस तरह न चाहिए
विधवा हुई है लड़की अभी उसको तो जीवन चाहिए।

आज रोता है सारा जहां हाथ बढाये तो हम हैं।
तुम्ही तुम हो हमीं हम है न तुम हम हो न हम तुम है।।

जाने वालों की गिनती गिनकर आंखें जैसे सूख गई।
अभी अभी‌ मेरी गली में एक मां की सांसें टूट गई।
अब हमें हनुमान बनकर संजीवनी लानी ही होगी।
जो सांसें थम रही उसमे हिम्मत जगानी ही होगी।।

आओ हम इंसान बनकर इंसानियत दिखाएं तो हम हैं।
तुम्ही तुम हो हमीं हम है न तुम हम हो न हम तुम है।।

 

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