माता -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Mata Part 1

माता  -माखनलाल चतुर्वेदी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Makahanlal Chaturvedi Mata Part  1

कोमलतर वन्दीखाना

‘शंकर’ थी; अब कारागृह है हिमगिरि की दीवार,
हाय गले का तौक बना गंगा-यमुना का हार;
धन्य ! बंग खंभात अब्धि की लहरों की हथकड़ियां,
रामेश्वर पर चढ़ी तरंगें बनी पैर की कड़ियाँ ।
कोमलतर बन्दीखाने के तीस कोटि बन्दी हैं
हों गुलाम, जीवन की बेहोशी में आनंदी हैं ।
(1923, माता)

लौटे

वह आता है किये निहाल, गर्व से उठाये भाल
पुष्य भूमि ह्रदय संभाले पथ में खड़ी;

अब जाता है हमारा शोक क्यों कर रहेगी रोक
दीन दुखी लोगों की अनी सी उमड़ी बड़ी;

सभी खीझने खिजाने और रीझने रिझाने वाले
प्रेमियों की सेना पद पूजते हुए अड़ी,

देवि, सास को सहारा दिये बालकों को गोदी लिये-
चूम, द्वार-झांकती लगाये आंसूयों की झड़ी !

(1924: फतहपुर के मुकदमे की सजा काट कर
स्व० भाई गणेश-शंकरजी के नैनी जेल से छूटने पर)

सेनानी

तुझको लख युग मुख खोल उठा, बेबस तब स्वर में बोल उठा,
तेरा जब प्रलय-गान निकला, ले, कोटि-कोटि शिर डोल उठा ।
आशा ऊषा यह द्वार खोज विजया, का सोना ले आई !
यह भली जगा दी तरुणाई !

माँ का ‘उभार’ खोलती सी, जीवन में ज्वर घोलती सी,
विष-घट खाली कर अमृत में घट-घट भर, मस्त डोलती सी,
जी की ज्वाला की दीप-माल आरती बनाकर ले आई,
यह भली जगा दी तरुणाई !

तू बल दे गिरतों को उदार, तू बल दे बलि-पथ को संवार,
तू बल दे मस्तक वालों को- मस्तक देने का स्वर उचार,
जगमग-जगमग उल्लास जगा दीपों में साध उतर आई ।
यह भली जगा दी तरुणाई !

तेरे स्वर पर प्रभु है लहरा, तेरे स्वर पर सुहाग ठहरा,
तेरा स्वर वह गहरा-गहरा, तेरे स्वर पर युग का पहरा,
तू महाप्राण, तू प्रलय गान, तू अमर प्राण, तू बलि महान;
तू मेरे अमर ! उठा वंशी दे फूंक साधना स्वर भाई ।

यह भली जगा दी तरुणाई !
(1927)

अमरते ! कहाँ से ?

अमरते आई दौड़ कहाँ से ।
यह यौवन, यह उभरन आली
छीनी कैसे माँ से !
अमरते

पलकें बिह्वल
प्रहर प्रतीक्षक
दिन दीवाने कैसे ?
मास मनाने
लगे, रूठकर
बैठी हूँ मैं जैसे ?
अमरते

माँ के घर-
रहना ही होगा
करके कठिन मजूरी,
मोहन देते
नहीं अभी
अपने घर की मंजूरी !
अमरते

तोड़ूंगी हिम-
शैल, बनाऊंगी-
पगडंडी पथ में !
विजय घोष
कर बैठेगा-
यौवन, झंझा के रथ में !
अमरते

जब आँखों से
दीख पड़ेगा
वह उन्मत्त जमाना
परम सुनहला
बन्ध मुक्त-
बल-वैभव का दीवाना !
अमरते

उदधि-जाधौत
चरणों पर अर्पित–
कोटि कोटि जयमाला,
कोटि कोटि
थाली जगमग की
मना रही दीवाली ।
अमरते

बैठे, चलो
समय के रथ–
किरनीली ज्योति जगा दें
और आत्म-मंथन
का कल-कल
ऊषा बनकर गा दें ।
अमरते

निर्झर, खंडहर,
तरु-कोटर में
गूंथा किसने स्वर है ?
मर्मर अमर-
अमर का गाना
सखि ! यह कौन अमर है?
अमरते

(1927)

दृढ़व्रत

बज्र बरसाने दे उन्हें तू खड़ा देखा कर,
फूल बिखराने दे लुभाते हैं लुभाने दे ।
गालियाँ सुनाने दे तू आरती उतारने दे,
दण्ड आजमाने दे या चन्दन चढ़ाने दे ।

होवे बनवास कारावास, नर्कवास
पद चूमे अमरत्व उसे पड़ा रह जाने दे,
साँवली सी सूरत को माधुरी सी मूरत को
प्राण बलि जाने दे तू आँखो से न जाने दे ।
(1913)

Leave a Reply