माँ गंगे! शुचि ताल तरंगे!-कविता-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh

माँ गंगे! शुचि ताल तरंगे!-कविता-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh

 

माँ गंगे ! शुचि ताल तरंगे !
सौ-सौ बार प्रणाम तुम्हें
पाप विनाशिनि! स्वर्ग निवासिनी!
वंदन आठों याम तुम्हें

कष्ट, ताप सह, गिरि-गह्वर,तम
जीवन के अवसाद, कठिनतम
नित्य लक्ष्य धर, चरण द्रुतगतिक्रम
बढ़े नित्य गंतव्य, न ले दम

तेरा दर्शन, शुचि मनभावन
जीवन-धन, तेरा नीराचमन
तव आराधन, देवाराधन !
तेरा स्पर्श स्वयं तीर्थाटन !

मोक्षदायिनी, अघविनाशिनी !
तालतरंगिणि, मृदुलहासिनी !
लक्ष्य अटल, ऊर्जा, गतिमयता
दिव्य, भव्यता की जीवन धन

शांति, सहिष्णुता, तपमय दर्शन
जीवन का गंतव्य सुदर्शन
पंथ अहर्निश, शुचि अंतरतम
‘चरैवेति-चरैवेति’ जीवन दर्शन

विघ्नबहुल पथ, अटल लक्ष्य, पर
साहस किसमें ? रोधित कर पथ
भ्रमित कर, कर दे लक्ष्य प्रकीर्णित
संकल्प धन्य, तव, जप-तप दर्शन!

शिव संकल्पी, पार्वति तनया !
विघ्नविनाशिनि, भाव सुहासिनि !
मातु भागीरथि! मन-मन वासिनि
दिव्यासिनि! शुचि सुरपुर वासिनि

हृदय-निवासिनी, पाप-विनाशिनि
धवल-तरंगिणि, शिव हर गंगे!
पर्वत-पर्वत नाद-निनादिनि!
ऋषि-मुनि की शिशु हास सुहासिनी

आँगन-आँगन जीवन-हर्षिणि
मन-मन मृदुता-मोद निष्कर्षिणि!
आशा, आस्था, दृढ़तावर्षिणि!
जीवन नव उल्लास रसवर्षिणि!

मातुल सम सुख, हास सुवर्षिणि!
जीवन, प्राण उच्छ्वास सुहर्षिणि!
बून्द-बून्द में जीवन, आयुष
वंदन, मातु! सुधारस वर्षिणि !

धवल-नवल नित, ऋषि-मुनि वंदित
नगर-नगर, गृह, मन अभिनंदित
साधक-साध्य व जप-तप मंत्रित
जीवन नित्य करे आनंदित

लक्ष्य अपरिमित, आशा तृष्ष्णित
लक्ष्योन्मुख जीवन तव दर्शन !
दुख-सुख समतामय नव दर्शन
करुणामय अनुभूति-निदर्शन

कर्म सुपथगा, दुख-क्लेश विमर्दिनी!
आनंद, शांति,भाव रस वर्षिणि !
कण-कण प्राण, मूल्य, धन हर्षिणि!
मोद निनादिनि, जीवन दायिनि !

वंदित मन-मन तव चरणामृत
जग हित जीवन सकल समर्पित
पा तव शुचि संसर्ग महानिधे!
जीवन हो नित दृढ़! संकल्पित

माँ ! तव करुणा, जल पा निशिदिन
हो जीवन का कण-कण चेतन
गिरि-गह्वर मृदु नाद-निनादिनि!
वर्णरहित चैतन्य वादिनी!

जीवनरस नव मोद प्रदायिनी
सुरसरि गंगे! मोक्षदायिनी
जड़-चेतन की प्राण, श्वास, मन
उपकृत तुझसे जग-जन जीवन

क्लांत जगत को नित नीरव कर
हो प्रशांत निज पथ, तज लोलुप
बहती मां द्रुतगति, लक्ष्योन्मुख
चीर निराशा के बदरा घुप

पग-पग, तप-जप, करुणा वर्षण
कर करती माँ जग पथ-दर्शन
उत्साह अपरिमित, अथक, अलौकिक
कर्म-बहुल तव मधुमय दर्शन !

सम या विषम कथा जीवन की
सबमें समता, सुख-दुख दर्शन
अटल लक्ष्य, तज क्षुद्राकर्षण
करती शुचि कर्तव्य निदर्शन

शिव जटावासिनि, बाल सुहासिनि!
मन-मन, करुणा, कर्म निनादिनि!
मधुर सुधारस, संचय कारिणी!
बांट अमृत रस, जीवन तारिणि!

तत्त्वादर्शन, तज सकल प्रदर्शन
करती क्षण-क्षण मोहक नर्तन
वैश्विक समता, सत-मति दर्शन
जप, तप, पग-पग भक्ति निदर्शन ।।

 

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