माँगना-खाना-भारत-भारती (वर्तमान खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Vartman Khand) 

माँगना-खाना-भारत-भारती (वर्तमान खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Vartman Khand)

 

माँगना-खाना

कर-युक्त भी क्या कार्य करना चाहते हैं हम कभी?
क्या हम कुलीन कुली बनें, होगा न हमसे श्रम कभी।
है मान रक्खा काम हमने माँगना आराम का,
जीते यहाँ पर हैं बहुत खाकर सदैव हराम का ! ॥२६०॥

हम नीच को ऊँचा बनाते भीख के पीछे कभी,
बनते कभी हम आप योगी और सन्तादिक सभी।
कोई गिने, कितने यहाँ पर माँगने के ढंग हैं,
नट-तुल्य पल पल में बदलते हम अनेकों रंग हैं ! ॥२६१॥

 

दासत्व

दासत्व करना भी हमें आया न अच्छी रीति से,
करते उसे भी हम अधम हैं अब अधर्म-अनीति से।
वह स्वामि-कार्य बने कि बिगड़े किन्तु अपना काम हो,
इस नीचता की नीचता का अब कहो, क्या नाम हो? ॥२६२।।

 

अधिकार

इम योग भी पाकर उसे उपयोग में लाते नहीं,
सामर्थ्य पाकर भी किसी को लाभ पहुँचाते नहीं ?
जैसे बुने हम दूसरों की हानि ही करते सदा,
अधिकार पाकर और भी अघ के घड़े भरते सदा ! ।। २६३ ।।

न्यायालयों में भी निरन्तर घूंस खाते हैं हमीं,
रक्षक पुलिस को भी यहाँ भक्षक बनाते हैं हमीं ।
कर्तृत्व का फल हम प्रजा पर बल दिखाना जानते,
हस दीन-दुखियों के रुदन को गान-सम हैं मानते ! ।।२६४।।

 

अभियोग

हा ! हिंस्र पशुओं के सदृश हममें भरी हैं क्रूरता,
करके कलह अब हम इसी में समझते हैं शूरता ।
खोजो हमें यदि जब कि हम घर में न सोते हों पड़े-
होंगे वकीलों के अड़े अथवा अदालत में खड़े ! ।। २६५ ।।

न्यायालयों में नित्य ही सर्वस्व खोते सैंकड़ों,
प्रति वार,पग पग पर, वहां हैं खर्च होते सैंकड़ों ।
फिर भी नहीं हम चेतते हैं दौड़ कर जाते वहीं,
लघु बात भी हम पाँच मिल कर आप निपटाते नहीं।।२६६।।

 

विपथ

देखो जहाँ विपरीत पथ ही हाय ! हमने है लिया,
श्रीराम के रहते हुए आदर्श रावण को किया !
हम हैं सुयोधन के अनुग तजकर युधिष्ठिर को अहो !
सोचो भला, तब फिर हमारा पतन दिन दिन क्यों न हो ॥२६७||

 

नशेबाज़ी

हम मत्त हैं, हम पर चढ़ा कितने नशों का रंग है-
चंडू, चरस, गाँजा, मदक, अहिफेन, मदिरा, भंग है।
सुन लो जरा हममें यहाँ कैसी कहावत है चली-
“पीता न गाँजे की कली उस मर्द से औरत भली!” ॥२६८॥

क्या मर्द हैं हम वाहवा ! मुख-नेत्र पीले पड़ गये;
तनु सूखकर काँटा हुआ, सब अंग ढीले पड़ गये।
मर्दानगी फिर भी हमारी देख लीजे कम नहीं-
ये भिनभिनाती मक्खियाँ क्या मारते हैं हम नहीं ! ॥२६९।।

अँगरेज वणिकों ने नशे की लौ लगाई है हमें,
हम दोष देते हैं कि तब यह मौत आई है हमें।
पर व्यर्थ है यह दोष देना; हैं हमी दोषी बड़े ;
हम लोग कहने से किसी के क्यों कुएँ में गिर पड़े? ॥२७०॥

जो मस्त होकर “तत्त्वमसि’ का गान करते थे सदा-
स्वच्छन्द ब्रह्मानन्द-रस का पान करते थे सदा।
मद्यादि पादक वस्तुओं से मत्त हैं अब हम वही,
करते सदैव प्रलाप हैं, सुध बुध सभी जाती रही ! ॥२७१॥

दो चार आने रोज के भी जो कुली मजदूर हैं–
सन्धमा समय वे भी नशे में दीख पड़ते चूर हैं।
मर जायें चाहे बाल-बच्चे भूख के मारे सभी,
पर छोड़ सकते हैं नहीं उस दुर्व्यसन को वे कभी! ॥२७२।।

शुचिता विदित जिनकी वही हम आज कैसे भ्रष्ट हैं,
किस भाँति दोनों लोक अपने कर रहे हम नष्ट हैं।
हम आर्य हैं, पर अब हमारे चरित कैसे गिर गये,
हम दुर्गुणों से घिर गये हैं, सद्गुणों से फिर गये! ॥२७३।।

 

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