महावलिदान-बापू -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

महावलिदान-बापू -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

चालीस कोटि के पिता चले,
चालीस कोटि के प्राण चले;
चालीस कोटि हतभागों की
आशा, भुजबल, अभिमान चले ।

यह रूह देश की चली, अरे,
माँ की आँखों का नूर चला;
दौड़ो, दौड़ो, तज हमें
हमारा बापू हमसे दूर चला ।

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