महाराना प्रतापसिंह का पत्र (पृथ्वीराज के प्रति)-पत्रावली -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Patravali

महाराना प्रतापसिंह का पत्र (पृथ्वीराज के प्रति)-पत्रावली -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Patravali

महाराना प्रतापसिंह का पत्र
(पृथ्वीराज के प्रति)

(पृथ्वीराज का पूर्वोक्त पत्र पाने के पूर्व ही महाराना
सन्धि-पत्र के लिए पश्चाताप कर रहे थे । उस पत्र
को पाकर उन्हें बहुत सन्तोष हुआ । यह पत्र उसी
पत्र के उत्तर में लिखा गया है)

निदाघ-ज्वाला से विचलित हुआ चातक अभी,
भुलाने जाता था निज विमल-वंश व्रत सभी ।
अहा! ऐसे ही में जलद सुख का सत्र पहुंचा,
अहो! पृथ्वीराज प्रियवर! कृपापत्र पहुंचा ।

दिया पत्र द्वारा नव-बल मुझे आज तुमने;
बचा ली बाप्पा के विमल-कुल की लाज तुमने ।
हुआ है आत्मा का यह प्रथम ही बोध मुझको;
दिखायी देता है न इस ॠण का शोध मुझको ।

सु-साथी हैं मेरे विदित कुलदेव ग्रहपति;
बनाये थी मानो मुकुट उनको मध्य जगती ।
पड़ा था छाया में, गहन वन में, मैं तरु-तले;
विचारों के सोते उस विजनता में बह चले ।

उदासी छाई थी, वह समय भी था विकट ही;
क्षुधा-क्षीणा बेटी रुदन करती थी निकट ही ।
वहां क्या था ? राज्ञी विवश मन में धैर्य धरके;
बनाती थी रोटी विरस तृण का चूर्ण करके ।

न मिथ्या बोलूंगा, उस समय भी मैं विमन था,
नहीं था मैं मानो शव-सम पड़ा शून्य तन था ।
मुझे सारी बातें स्मरण अब भी स्वप्न-सम हैं,
बताऊं मैं कैसे विधि-नियम जैसे विषम हैं ।

भविष्य-चिन्ता ही उस समय थी घोर मुझको;
दिखाई देता था घनतम सभी ओर मुझको ।
हरे! क्या होना है, समझ पड़ता है कुछ नहीं,
न होगी क्या मेरी सफल यह आशा अब कहीं ।

मुझे भी औरों के सदृश वह दासत्व सहके,
पड़ेगा जीना क्या पशु-सम पराधीन रहके!
झुकाना होगा क्या सिर अरि-जनों को अब मुझे,
न होगा आत्मा का हनन करना क्या तब मुझे ।

न होगी आर्यों की अहह! अब क्या आर्यधरिणी?
हमारी होगी क्या अतल जल में मग्न तरणी?
अनार्यों ही का क्या अब अटल है शासन हरे!
हुआ क्या आर्यों का अब निपट निष्कासन हरे!

हमारे भाई ही बनकर विपक्षी जब यहाँ,
मिले हैं तुर्कों से तब भला मंगल कहां?
न होने पाती जो स्फुटित हममें फूट इतनी,
मचाते तो कैसे अरिगण यहां लूट इतनी?

गड़े थे पृथवी में विपुल विजय-सतंभ जिनके,
जिन्होने थे सौ सौ विधीयुत किये यज्ञ गिनके!
बने हैं पापी भी सुकृती सुनके कीर्ति जिनकी,
हुए हैं कैसे हा! पतित हम संतान उनकी ।

विचारों में था यों जिस समय मैं व्याकुल बड़ा,
कि भारी चीत्कार श्रवणकर चौंक, जग पड़ा ।
कहूं हा! देखा क्या प्रकट अपनी मृत्यु-घटना,
अचंभा है मेरे हत हृदय का ही न फटना ।

बनी थी जो रोटी विरस तृण का चूर्ण करके,
बचाती बेटी को उस समय जो पेट भरके ।
उसे देखा मैंने अपहृत विड़ालीकृत वहां,
न देखा बेटी को अहह! फिर था साहस कहां ।

विधात! बाप्पा के अतुल-कुल की हा! यह गति;
किसी ने देखी है अवनि पर ऐसी अवनति!
जिन्हें प्रासादों में सुख सहित था योग्य रहना,
उन्हें खाने को भी वन वन पड़े दु:ख सहना!

स्वयँ मैं ही हूं क्या इस विपद का कारण नहीं,
व्रतों के पीछे भी जिस विपद में पारण नहीं ।
नहीं तो रोते क्यों यह शिशु कि है राज्य जिनका,
मुझे चाहे जो हो पर अहह! क्या दोष इनका ।

क्षुधा से बेटी का वह तड़पना मैं निरख के;
न हे पृथ्वीराज! स्थिर रह सका धैर्य रखके ।
मुझे आत्मा की भी सुधबुध न हा! रंचक रही,
क्षमा कीजे मेरी यह अबलता-केवल यही ।

न सोचा मैंने हा! कि यह सब है दैव-घटना;
स्व-कर्त्तव्य से समुचित नहीं नेक हटना ।
विधाता जो देवे ग्रहण करना ही उचित है;
उसी की इच्छा में सतत शुभ है और हित है ।

कहीं सोचा होता धृति सहित मैंने यह तभी,
न होता तो मेरा यह पतन आकस्मिक कभी।
सहारा देते जो तुम न मुझको सम्प्रति वहाँ,
न जाने होता तो उस पतन का अन्त न कहाँ ।

तुम्हारी बातें हैं ध्वनित इस अन्त:करण में,
पुन: आया मानो अखिलपति की मैं शरण में ।
यही आशीर्वाणी अब तुम मुझे दो हृदय से,
न छोड़ूं जीते जी यह व्रत किसी विघ्न-भय से ।

यही आकांक्षा है, जब तक रहूँ देह-रथ में,
किसी भी बाधा से विचलित न होऊँ स्वपथ में ।
जिसे आत्मा चाहे सतत उसका साधन करूं,
उसी की चिन्ता में रहकर सदा चिन्तित मरूं।

तुम्हारी वाणी है अमृत, कवि जो हो तुम अहो!
जिया हूँ मैं मानो मरकर पुन: पूर्व-सम हो ।
सहूंगा दु:खों को सतत फिर स्वातन्त्र्य-सुख से,
करूँगा जीते जी प्रक्ट न कभी दैन्य मुख से ।

तुम्हारा ‘पत्ता’ है जब तक, सहे क्यों न विपदा,
करो मूंछें उंची तब तक सखे! ‘पीथल’ सदा ।
सुनोगे तुर्कों को न तनु रहते शाह हमसे,
वहीं-प्राची में ही-रवि उदित होगा नियम से ।

Leave a Reply