महामारी-अंतर्यात्रा-परंतप मिश्र-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Parantap Mishra

महामारी-अंतर्यात्रा-परंतप मिश्र-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Parantap Mishra

 

मानवीय अध्यन के परिणामस्वरूप,
जगत के जीवों का विभाजन हुआ,
वनस्पति जगत और पशु जगत ।
मानव ने अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करते हुए,
स्वयं को पशु जगत से अलग कर लिया,
अपनी बुद्धि कौशल से जगत के परिणामों को,
अपने पक्ष में करने की क्षमता विकसित की है,
परिस्थितियों को अपने अनुकूल करने का

सतत प्रयास जारी है ।
अविभाज्य दुनिया पर,
धर्म-सम्प्रदाय, अमीर-गरीब,
विकसित-विकाशील, गोरे-काले की,
विभाजन रेखा से लोगों को,
खानों में बाँट दिया है ।
शेष पशु जगत आज भी वहीं खड़ा है
वनस्पतियों के साथ जुड़ा है,
विभाजित नही हो सका है,
पर बदलाव का साक्षी रहा है ।
मुझे याद है,
हम चिड़ियाघर जाकर,
पशुओं के निजता और स्वतंत्रता,
से परे होकर उनके जीवन का दर्शन,
मनोरंजन के लिए किया करते थे ।
और वे हमसे आँख नहीं मिला पाते थे,
कैसा होता है प्रतिबंधित होकर,
अपना जीवन जीना,
महामारी के प्रकोप से बचता,
श्रेष्ठ मानव आज स्वयं बैठा है,
स्वनिर्मित चिड़ियाघर में बेबस और उदास,
तब कुछ पशु जगत के उदार लोग,
आकर शहरों में, कैद-
परिष्कृत मनुष्यों को देखते हैं,
पर मनोरंजन की दृष्टि से नहीं ।
मानवता से, सहृदयता से पूछते हैं,
“इतना सन्नाटा क्यों है ? सबका मंगल हो”
प्रकृति की यही नियति है ।

 

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