महल-अटारी-आत्मा की आँखें -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar 

महल-अटारी-आत्मा की आँखें -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

चिड़िया जब डाल पर बैठती है,
अपना सन्तुलन ठीक काने को दुम को जरा ऊपर उठाती है ।
उस समय वह कितनी खुश नजर आती है?

मानों, उसे कोई खजाना मिल गया हो;
जीवन भर का अरमान अचानक फूल बन कर खिल गया हो ।

या विरासत में कोई राज उसने पाया हो
अथवा अभी-अभी ऐसा नीड़ बनवाया हो,
जिसमें एक हिस्सा मर्द का है
और एक जनाना भी;
ड्राइंग-रूम भी है और गुसलखाना भी।

महल-अटारी के लिए आदमी बेकार रोता है ।
मैं पूछता हूँ
इस चिड़िया की तरह वह खुशा क्यों नहीं होता है ।

Leave a Reply